मित्रता

मित्रता


नही रिश्ता लहू का है,
मगर फिर भी सुधा रस सा। ।।1।।
कभी तकरार तीखी सी,
कभी मीठा है मधुरस सा। ।।2।।
सजा सौहार्द रंगों से,
बंधा विश्वास की डोरी। ।।3।।
है साथी सुख दुःखो का,
उजाला बन के दीपक सा। ।।4।।

कभी बचपन की गलियों में,
पतंगों संग उड़ता है ।। ।।5।।
कभी कागज की कश्ती में,
हजारों रंग भरता है।। ।।6।।
कभी लूडो,कभी कैरम,
कभी कंचों में नजर आए।। ।।7।।
न्योछावर कर दे जां हँस कर,
वो रिश्ता मित्रता का है। ।।8।।

निभाया था जटायू ने,
दिया बलिदान प्राणों का। ।।9।।
उठाया गोद में राघव ने,
दिया स्पर्श हाथों का। ।।10।।
अमर गौरव हुआ उसका,
सजा इतिहास पन्नो में । ।।11।।
हनु,सग्रीव,विभीषण ने,
पढ़ाया पाठ मैत्री का। ।।12।।

सखा बचपन के थे दोनों,
समय के साथ बिछुड़े है। ।।13।।
सुना कानों से मोहन जब,
सुदामा विप्र आये है। ।।14।।
चले आतुर हो मिलने को,
गिरा जब वस्त्र धरणी पर। ।।15।।
भुजा भर अंक में बांधा,
विंदु आंखों से छलके है। ।।16।।

स्वरचित एवं मौलिक

शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश "उरई"

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