मेरी यादगार मेट्रो यात्रा

मेरी यादगार मेट्रो यात्रा

अकेली मैं ही नहीं, बहुत से लोगों को आए दिन इस अनुभव से गुज़रना पड़ता है... मेट्रो सफर का मजेदार अनुभव आप सब के साथ सांझा कर रही हूँ... याद करके हँसी आती है... हा हा...

दिल्ली तो कई  बार जाना हुआ लेकिन हर बार कार से... पिछले साल कुछ ऐसा हुआ..कि बड़ी मजेदार यात्रा रही... हुआ ये कि मेरी बेटी दिल्ली में पढ़ती है... वहाँ मुझे काम से जाना था... मेरे पति डॉक्टर हैं... तो इनके पास समय नहीं था... और उस दिन ड्राइवर भी नहीं मिला... तो मैं बस से चली गयीं... बस स्टॉप पर बेटी मिल गयीं... आगे का सफर हमें मेट्रो से करना था...

तो पहले उसने मेरे फोन में मेट्रो मैप इनस्टॉल किया और अच्छे से समझाया...मेट्रो स्टेशन पहुँचकर बोली... बताओ कहाँ कैसे जाना हैं... मैंने मैप में देख कर बताया... अगर कुछ गलत बताती... तो वो समझा देती। देखो मॉम यहाँ से लाइन चेंज करनी है... इस गेट से बाहर नहीं निकलना...और भी न जाने कितनी हिदायते... क्योंकि मुझे वापस अकेले आना था... वो समझाती और मैं समझती अपने गंतव्य तक पहुँच गये।

जिस काम से गई थी... वो किया... और फिर वापसी की तैयारी... मेट्रो से अकेले आते हुए थोड़ा डर भी लग रहा था... और मन में धुक-धुक भी हो रही थी.. परन्तु बेटी के सामने ऎसे दिखा रही थी...कि ये तो चुटकी बजाने जैसा है...खैर टिकट लिया.. और निकल पड़ी इस जद्दोजहद में... कि प्लेटफॉर्म पर किधर का रुख करुँ...

कभी लगता...फर्स्ट फ्लोर से पकड़नी थी मेट्रो... कभी लगता... नहीं यही से ही... भीड़ अपने रास्ते भागी जा रही थी... लग रहा था... इतनी बड़ी दुनिया में खो गयी हूँ...भागती हुई एक लेडी से पूछा... यहाँ जाना है... किधर से पकडू मेट्रो.. उनसे भागते हुई ऊपर की ओर इशारा कर दिया... मैं तसल्ली की सांस छोड़ते हुए चल पड़ी उस ओर। परंतु कितना ऊपर... फर्स्ट फ्लोर पर पहुँचकर फिर बौरा गई... बेटा अब क्या?.. डिजिटलाइजेशन के दौर में किसी से पूछते हुए झेप रही थी... शाम हो गई थी.. अचानक याद आया... बेटी ने बताया था कि मॉम एक स्टेशन पर थर्ड फ्लोर पर जाना है... थोड़ा कॉन्फिडेंस आया... फटाफट पहुँची 3rd फ्लोर... वहाँ गंतव्य का बोर्ड देख राहत की सांस ली...

आख़िकार मेट्रो में बैठ ही गई... सीट भी वो चुनी जिसके सामने डिजिटल मैप चल रहा था... सब ठीक था... बेटी का फोन आता है... मॉम खो तो नहीं गई...अटकती हुई जुबान में बोली... अरे बेटा... मैं तो मेट्रो मैं बैठ भी गई... सब आराम से हो गया ..

यही तक काफी नहीं हुआ... आगे भी सुनिए... सामने वाली सीट पर कोई लेडी अपने बच्चे के साथ कुछ परेशान सी दिखी... मेरी बेटी से बातें सुनकर समझी..इन्हें बहुत जानकारी है . मेरे से आँख मिली... तो बोली... मुझे उस स्टेशन पर जाना है...कहाँ से बदलनी है मेट्रो... अब हम अपनी बेज्जती थोड़े ही करवाते...मैप निकल लिया फोन मे और लगे उसे समझाने... वो भी बहुत इम्प्रेस ... तभी थोड़ा दूर बैठी 1 लेडी बोली... नहीं नहीं... वहाँ से नहीं... सुनिए आप यहाँ पर ही उतर जाना... वरना परेशानी होगी... हमने झेपते हुए बोला... हम भी नए ही है... ओर चुप बैठ गये...

अब जब हमारा स्टेशन आया... तो गेट पर ऎसे तैनात हो गए... कि रुकते ही  भागकर फ़ौरन बाहर ना निकले... तो अंदर ही बंद हो जायेंगे ... जैसे ही मेट्रो रुकी... धक्का करते हुए बाहर... जब स्टेशन से बाहर आये... तो चैन की सांस ली... ओर मन मे प्रभु का धन्यवाद दिया कि ... हे भगवान! बचा लिया आज तो तुमने...

तो ऎसे खट्टी मीठी यादों से गुजरी हमारी मेट्रो यात्रा... याद करके समझ नहीं आता... कि हँसे या घबराये...हा हा हा अभी आप लोग कमैंट्स करके अपने अनुभव बताएं  कि क्या आपके साथ भी ऐसा कुछ हुआ था...

मेरा संस्मरण...

रूचि मित्तल 

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