#नखरें ' कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता'

#नखरें '  कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता'

कॉलेज के दिनों में प्रभा की एक बहुत ही सुंदर सहेली हुआ करती थी सलोनी। आज अचानक सालों बाद प्रभा मार्केट में सलोनी से टकराई तो वो एक बार के लिये तो उसे बिल्कुल पहचान ही नहीं पाई ।


छरहरी काया, लंबा कद, कत्थई रंग की गहरी झील सी आंखें और उस पर खूबसूरत घने बादलों जैसी काली रेशमी जुल्फों की मल्लिका, एसी हुआ करती थी कभी सलोनी। वो सचमुच में तब किसी शायर की खूबसूरत गज़ल जैसी ही लगा करती थी। 

इस पर ये जो कहावत हैं ना कि "खुदा जब हुस्न देता है, तो नज़ाकत आ ही जाती है।" बस ऐसा ही कुछ सलोनी के साथ भी था। एक तो पहले ही वो बला की खूबसूरत थी, इस पर उसके नखरें, जैसे 'सोने पे सुहागा'। सलोनी को हमेशा से बन-ठन के रहने की आदत थी। एक तो वैसे ही उस पर हर रंग खिलता था, उस पर कपड़ों और 'आर्टीफिशियल ज्वैलरी' के मामले में उसकी चॉइस भी बड़ी ज़बरदस्त थी।


जो भी सलोनी को देखता, वो उसकी खूबसूरती और उसके नखरीलें अंदाज़ का दीवाना हुए बिना ना रहता। कानों मे बड़े-बड़े झुमके, हाथों मैं घुंघरू वाली चूड़ियां और उसकी लम्बी कमर तक लहराती खुली जुल्फें किसी को भी अपना दीवाना बना दिया करती थी।


उन दिनों कॉलेज में भी सलोनी के चाहने वालों की बड़ी लंबी कतार हुआ करती थी, मगर उसने कभी भी किसी को भाव नहीं दिया। वैसे सुंदरता के साथ-साथ सलोनी गुणों की भी खान थी। पढ़ने लिखने में तो खैर वो ठीक-ठाक ही थी, मगर शायरी लिखने और पेंटिंग करने में उसे बड़ी रूचि थी। जहां भी उसे थोड़ी भी सुंदरता दिखाई देती, वो उसे तुरंत अपने डायरी के पन्नों और कैनवास पर उतार दिया करती थी।


अपनी इन्हीं गुणों के कारण वो उस दौर में ना केवल लड़कों की चहैती हुआ करती थी, बल्कि उनकी मांएँ भी सलोनी में अपनी भावी बहू की छवि देखा करती थी। खैर किसी तरह से सलोनी ने बड़ी मेहनत-मशक्कत से ग्रेजुएशन पास कर लिया। ग्रेजुएशन के बाद प्रभा अपनी आगे की पढ़ाई के लिए मुंबई चली गई। तभी कुछ महीनों बाद उसने किसी सहेली से सुना था कि सलोनी का धूमधाम से ब्याह करा दिया गया था।


उसके बाद इतने बरसों तक कभी प्रभा और सलोनी की कोई मुलाकात नहीं हुई। मगर आज अचानक फिर से दोनों सखियाँ अनजाने में ही एक-दूसरे के सामने आ खड़ी हुई थी। 


हमेशा खूबसूरत चटक रंगों के फेशनेबल कपड़े पहनने वाली सलोनी एक सादी सी क्रीम कलर की अनाकर्षक सी साड़ी और बिना किसी मेकअप और ज्वैलरी के हमेशा से बहुत अलग और बहुत अधूरी सी लग रही थी।हमेशा खुली लहराती रहने वाल खूबसूरत ज़ुल्फों को भी उसने बड़ी ही लापरवाही से एक टाइट चोटी में बांध के रखा हुआ था। एक पल के लिए तो प्रभा उसे बिल्कुल भी पहचान ना पाई , मगर उसकी झील जैसी कत्थई आंखें अब भी बिल्कुल पहले की तरह ही खूबसूरत लग रही थी। बस उसमें एक अजीब सा सूनापन प्रभा को नज़र आ रहा था।


दोनों सखियाँ एक-दूसरे से बड़ी ही गर्मजोशी से मिली। कुछ औपचारिक बातों के बाद सलोनी प्रभा से मिलकर जाने लगी, तो प्रभा ने पूछ ही लिया, "अगर तुम्हारे पास कुछ समय हो तो कहीं चल कर बैठते हैं सलोनी। कॉलेज के बाद इतने सालों बाद आज मिले हैं। मेरा घर यहाँ पास में ही है, अगर तुम्हें कोई प्रॉब्लम ना हो तो कुछ देर साथ मिलकर फिर पुराने लम्हों की याद ताज़ा करेंगे।"


प्रभा ने इतने इसरार से पूछा था कि सलोनी इंकार ना कर सकी। दोनों सखियां प्रभा के घर जा पहुंची। प्रभा का घर बहुत ही खूबसूरत था। सलोनी ने आते ही उसके खूबसूरत से घर की तारीफ की।


कुछ देर इधर-उधर की बातें करने के बाद आखिर प्रभा से नहीं रहा गया और उसने सलोनी से पूछ ही लिया," सलोनी सब ठीक तो है ना। तुम काफी बदली-बदली लग रही हो।"


सलोनी ने फीकी सी हँसी हँसते हुए कहा," हां प्रभा सब बिल्कुल ठीक है, तुमने ऐसा क्यों पूछा ?"

इस पर प्रभा ने कहा," देखो सलोनी मुझे गलत मत समझना। दरअसल कॉलेज में तीन साल हम दोनों ने साथ में बिताए हैं और हम दोनों एक-दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त रहे हैं। बस इसीलिए मैं समझ नहीं पा रही हूं, कि आखिर इन सालों में ऐसा क्या हो गया कि तुम पूरी तरह से बदल गई हो।"

"तुम्हें तो हमेशा से ही कितना सज-सँवरकर रहने का शौक हुआ करता था। तुम्हारी हंसी में क्या खनक हुआ करती थी,तब। अब तुम्हारी हँसी की वो खनक, तुम्हारे वो नखरे सब कुछ 'मिसिंग' है। आखिर कहां गई वो बिंदास, ज़िंदादिल और नखरीली सलोनी?"

प्रभा की फिक्र भरी बातों की आँच से सलोनी के सीने में बरसों से जमी बर्फ पिघलकर उसकी आंखों के रास्ते बह निकली।

फिर थोड़ी देर रो कर कुछ मन हल्का हो लेने पर सलोनी ने प्रभा से अपने चिर परिचित शायराना अंदाज़ मे कहा ,"कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता प्रभा। कॉलेज तक जिंदगी बहुत ही खूबसूरत हुआ करती थी। मगर उसके बाद जैसे अचानक से सब कुछ बदल गया।"

कॉलेज खत्म होते ही कुछ ही महीनों में मेरी शादी शहर के एक बहुत अमीर व्यापारी के बेटे अमित के साथ हो गई।शुरू-शुरू में सब कुछ सही था, मगर धीरे-धीरे मेरे सामने अमित और उसके परिवार वालों की सारी सच्चाई सामने आने लगी।"

"मेरे सास-ससुर बहुत ही ज़्यादा 'डोमिनेटिंग' थे। उनकी मर्जी के बिना हमारे घर में एक पत्ता भी नहीं हिलता था। अमित को बिज़नेस करने का ना कोई अनुभव था ना ही कोई शौक। वह तो बस अपनी ही ऐशो-आराम की दुनिया में मस्त रहा करता। उसके बड़े भैया ही पापाजी के साथ पूरा बिज़नेस संभाला करते थे।"

"शादी के बाद घर में मम्मी जी हमेशा अपना हुक्म चलाया करती थी। ये मत करो, वो मत पहनो, यहां मत जाओ, उससे मत बात करो, हमेशा यही सब सुनकर धीरे-धीरे मैं पूरी तरह से अपना आत्मविश्वास खोने लगी थी।"

"बड़े भैया चूंकी बिजनेस संभालते थे, इसलिये जेठानी जी का भी घर में थोड़ा दबदबा था। मम्मीजी, पापाजी, बड़े भैया, भाभी, अमित उन सभी के नखरे उठाते-उठाते और उन सब के कहे अनुसार जीवन जीते-जीते मैं नखरें करना क्या खुद अपनी इच्छानुसार जीना तक पूरी तरह से भूल गई थी। सच बताऊं तो अब तो किसी चीज़ का ज्यादा शौक नहीं रह गया जीवन में।"

"फिर पापाजी के चले जाने के बाद पूरा बिजनेस भैया ही संभालने लगे। एसे में अब मैं, अमित और मेरे बच्चें, पूरी तरह से अब माँजी और भैया-भाभी के रहमों-करम पर उनकी छत्रछाया में ही जी रहे हैं।"

"अब तुम्ही बताओ प्रभा, मुझे तो अपनी हर आती-जाती सांसे भी किसी के अहसानों के तले दबी हुई सी लगती है, अब ऐसे मे क्या तो मैं सजू-सँवरू और किसके लिये नखरें करू और खनखनाती हुई अपनी हँसी बिखेरू।"

सलोनी के मुंह से उसकी दुःख भरी दास्तान सुनकर कुछ पल के लिए तो प्रभा भी नि:शब्द हो गई । मगर फिर उसने कहा," सलोनी अगर तुम चाहो तो अमित मे एक नया आत्मविश्वास जगा कर उसे कोई नौकरी करने या खुद का नया बिजनेस शुरू करने के लिए मना सकती हो, या खुद तुम जॉब करके उसका हाथ बटा सकती हो, मगर इस तरह उम्र भर बिना रीढ की हड्डी के जीवन जीना तो सरासर कायरता होगी।"

सलोनी ने प्रभा को बताया,"मैं अपनी तरफ से सारी कोशिश करके हार चुकी हूँ। अमित खुद को किसी भी कीमत पर बदलने के लिए तैयार नहीं।एक वक्त था, जब मैं उससे अलग होने के बारे में भी सोचा करती, पर मायके में भी तब किसी ने मेरे इस फैसले मे मेरा साथ नहीं दिया। फिर अब तो, खैर मेरे दोनों बच्चों की ज़िम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। मेरी छोटी मोटी जाॅब कर लेने से भी हमारी जिंदगी में अब कुछ भी नहीं सुधर सकता।"

प्रभा को समझ नहीं आ रहा था,"वो सलोनी को किस तरह से मोटिवेट करें कि, वो फिर से अपनी ज़िंदगी को एक अलग बेहतर ढंग से जीना शुरु कर सकें।

मगर फिर भी उसने कुछ सोचकर सलोनी से कहा, " सलोनी तुम्हें तो पेंटिंग करना भी बहुत ज्यादा पसंद था। हो सके तो पेंटिंग करना फिर से शुरू कर लो।खुद को फिर से ऐसे कामों में व्यस्त करो जो तुम्हें कभी पसंद हुआ करते थे। अगर कभी नौकरी करने का मन हो, तो मुझे ज़रूर बताना।मुझसे जो बन पायेगा, तुम्हारे लिये कोशिश करुंगी। बस जैसे भी सँभव हो, तुम खुद की खुशियों के लिए और अपने बच्चों के लिए फिर से खुलकर जीना शुरु कर दो।"

सलोनी ने फीकी सी हँसी हंसते हुए प्रभा से कहां,"आज बरसों के बाद अपनी मन की बात किसी के साथ शेयर करके बहुत अच्छा लगा प्रभा।मैं वादा तो नहीं करती, मगर कोशिश ज़रूर करूंगी, तुम्हारी कही गई बातों पर अमल करने का।" इतना कहकर फिर सलोनी उठ खड़ी हुई और प्रभा से फिर मिलने का वादा कर के वहां से निकल गई।

प्रभा चुपचाप अपनी नखरीली सखी सलोनी के उस बदले हुए रूप को तब तक देखती रही जब तक वो उसकी आंखों से ओझल नही हो गई।

सकीना साबुनवाला✍।

#नखरें

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