ननद समझा लेंवें

ननद समझा लेंवें

सभी लड़कियो की तरह सपना की आँखो में भी ढे़रो सपने थे ससुराल को लेकर। सपना के मायकेवाले थोडे़ रूढि़वादी किस्म के थे। हर बात के लिये मनाही थी- कपडो़ को लेकर, कभी लड़को से बात करने को लेकर आदि। सपना अपनी शादी को लेकर बहुत उत्साहित थी । उसे लगता था कि शादी के बाद मायके वालो की रोक-टोक से छुटकारा मिलेगा।

यही सब सोचकर सपना ने प्रवेश किया अपनी ससुराल में। लेकिन यह क्या!  कभी सास पल्लू के लिये टोकती, कभी चूडी़, बडी़ बिन्दी, कभी कुछ तो कभी कुछ। सपना का रोक-टोक से छुटकारा मिलने का सपना बस सपना ही रह गया। नवविवाहित सपना बहुत उदास रहने लगी। उसका पति भी अपनी नौकरी पर दूसरे शहर जा चुका था। लेकिन सास के रवैये में कोई बदलाव नही आया था।सपना को अपनी सास की  बात-बात पर रोकटोक बहुत अखरती थी। उसकी यह उदासी उसके ननद निशा से छिपी न रह सकी। आखिर एक दिन निशा ने पूछ ही लिया-क्या बात है भाभी? बहुत उदास रहती हो। यहाँ मन नही लग रहा है क्या? मायके की याद आ रही है? या भैया की?

हम उम्र निशा की हमदर्दी पाकर सपना ने अपना दिल उडे़ल दिया उसके सामने। सारी बातें सुनकर निशा बोली-भाभी माँ की बातें दिल पर मत लो। वह थोडे़ पुराने ख्यालो की है। धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा। समय के साथ थोडा़ वो बदलेंगी, थोडा़ आप बदलना। ठीक है।और जब आप भैया के पास जाकर रहोगी, तो जैसे आपका मन हो वैसे रहना।

चलो अब थोडा़ मुस्कुरा दो।

सपना, निशा के गले लगकर बोली- थैंक्यू दीदी। आपकी बात मैं समझ चुकी हूँ। अब कभी उदास नही होऊंगी। 

सपना के लिये तो यह गाना बिल्कुल जैसे सार्थक ही हो गया था - सास गाली देंवें, ननद समझा लेवें, ससुराल गेंदा भूल।

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