नाता प्रथा या एक कुप्रथा ?

नाता प्रथा या एक कुप्रथा ?

समाज का एक वर्ग जहाँ 21वीं सदी से भी आगे की सोच रखकर कहाँ से कहाँ पहुँच गया वहां दूसरी ओर कुछ एक लोग 18वीं सदी की दहलीज़ लाँघना ही नहीं चाहते प्रथा और परंपरा के नाम पर क्या क्या चलता रहता है। लिव इन रिलेशन\" की परंपरा हमारे देश में प्राचीन काल से ही किसी न किसी रूप में देखने को मिलती रही है। भारत के कई क्षेत्रों में इस परंपरा से मिलती जुलती प्रथाएं देखी जा सकती हैं। इन्ही प्रथाओं में एक प्रथा है राजस्थान की नाता प्रथा। नाता प्रथा राजस्थान में प्रचलित पुरानी प्रथाओं में से एक है। राजस्थान की कुछ जातियों में प्रचलित नाता प्रथा के अनुसार विवाहित महिला अपने पति को छोड़ कर किसी अन्य पुरुष के साथ रह सकती है। वहीं पुरुष भी किसी विवाहित महिला को उसकी सहमति से लाकर पत्नी के रूप में रख सकता है। इसे नाता विवाह कहते हैं।


नाते के नाम पर देह की देहरी बदलती जाएगी और धन का ऐसा इस्तेमाल आधुनिक समाज करेगा शायद ही किसी सभ्य समाज ने ऐसी घृणित कल्पना की होगी लेकिन राजस्थान के बड़े हिस्से और कई जातियों में यह नाता-प्रथा जारी है।

देखने वाली बात यह है कि यह लेन-देन का व्यापार स्त्री अस्मिता को बचाने के नाम पर होता है।


नाता शब्द की एक गरिमा होती है, दो लोग या परिवार को जोड़ने वाला शब्द लेकिन जब इसके साथ प्रथा जुड़ जाती है तो यह नाता प्रथा बन जाती है। ये प्रथा स्त्री अस्मिता बचाने के नाम पर बेचने का व्यापार स्त्रियों से जुड़ी वह प्रथा जो पूरी तो पुरुष के साथ मिलकर होती है लेकिन उसके दुष्परिणाम केवल स्त्री के हिस्से आते हैं।


कभी विधवा और परित्यक्त स्त्री के सामाजिक संस्कार में लौटने से शुरू हुई यह परंपरा आज स्त्री के शोषण का ज़राया बन चुकी है। राजस्थान की कुछ जातियों में स्त्री अपने पति को छोड़कर किसी अन्य पुरुष के साथ रह सकती हैं। इसमें कोई औपचारिक रीति रिवाज़ नहीं करना पड़ता इसलिए इस रिश्ते को कोई कानूनी सरंक्षण भी नहीं मिल पाता। पांच गाँव के पंच मिलकर फ़ैसला कर देते हैं। कभी-कभार तो पिता या पति को कुछ रकम देकर भी रिश्तों का सौदा हो जाता है। इसे झगडे की राशि कहा जाता है जिसमें पंचों का भी हिस्सा होता है। जबरदस्ती नाते भेजने के मामले भी सामने आते हैं। अपनी मर्ज़ी से साथी चुनने के मौलिक अधिकार से चली इस परंपरा ने कुप्रथा का रूप ले लिया है। और राजस्थान की कई जातियां इसकी गिरफ्त में है।


नाता प्रथा की आड़ में कई पुरुष उस स्त्री को उसके दाम्पत्य से अलग कर झगड़े की रकम उसके पति को चुका देते हैं। इसके बाद दोनों के साथ रहने के दौरान महिला-पुरुष के बीच कोई विवाद हो जाता है तो अलग होने के लिए फिर से नाता राशि की वसूली की जाती है। इस विवाद को लेकर महिला की ओर से अपहरण, दुष्कर्म, यौन शोषण, दहेज प्रताडऩा की धाराओं में भी मामले दर्ज करवाए जाते हैं। महिला अत्याचारों को लेकर दर्ज होने अपराधों के आंकड़ों की बात करें तो इस प्रथा को लेकर असंख्य केस दर्ज़ हुए है ।पति आर्थिक रूप से कमज़ोर है तो न आवाज़ उठा पाता है और न बच्चों को अपनी माँ से मिलवा पाता है।


स्त्री को अपने बच्चों से भी अलग होना पड़ता है। कुछ हद तक यह प्रथा आज़ाद भारत में किसी कबीलाई संस्कृति के फैलते रहने की तस्दीक भी करती है। स्त्री न हुई एक देह हो गई जो सड़ी-गली सामाजिक कुप्रथाओं की बलि चढ़ती रहती है। स्त्री के खिलाफ होनेवाले इन अपराधों को इतनी सफाई से सामाजिक मर्यादा और ज़िम्मेदारी का नाम दिया गया है कि वह ना चाहकर भी सब बर्दाश्त करती है। भ्रूण -हत्या बाल-विवाह ,दहेज़ ,पर्दा ,डायन प्रथा जैसी कुरीतियां आज भी राजस्थान में स्त्री की कमज़ोर दशा के लिए ज़िम्मेदार है। अब और कितना विमर्श लिखें जब स्त्री अपने लिए ही आवाज़ उठाने में अक्षम है तो उससे कोई और परिपक्वता की उम्मीद कैसे की जा सकती है।


(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु

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