ओ स्त्री तुम आज जियो !

ओ स्त्री तुम आज जियो !

मेरे घर के सामने वाले घर में कोई नयी फैमिली शिफ्ट हुई , बिखरा हुआ सामान और बालकनी में जहाँ के तहाँ पड़ी वो नील कमल वाली कुर्सियां। सब थके हारे ,अपनी अपनी जगह पकडे राहत की दो सांस लेने की कोशिश कर रहे थे। ज़्यादा बड़ी फैमिली नहीं लगती बस एक युवक लड़की और एक लड़का और माता पिता ! एक बूढी महिला और है ” बच्चों की दादी है या नानी कुछ समझ नहीं आता , बुढ़ापा हाथ पैर की रंगत के साथ ,चेहरे के हाव भाव का फीका रंग भी साथ लाता है।

ये सब क्यों लिखा जा रहा है ” आइये एक नज़र थोड़ी बारीकी से चलाते हैं , सबके हाथ में चाय के कप ,मगर एक सदस्य ऐसा जिसे चाय तो बहुत दूर , पानी पीने तक का होश नहीं ! फ़िक्र बस चोखटों पर लगी धूल साफ़ करने की , और ज़िद परदे जल्दी खिड़कियों पर लग जाये , सफाई जल्दी जल्दी कैसे होगी , नई मेड कैसे मिलेगी , इसकी फ़िक्र में घर का सिर्फ सदस्य अपनी मानसिक शांति की आहुति दे रहा है ! ना ना आप गलत समझे ये कोई बुराई नहीं बाकि परिवार के सदस्यों की ,और न ही उन्हें इस घर में कोई परेशान करता है।

जो ये एक अकेला प्राणी जीवन नाम के संगीत की धुन भूल गया है , इस प्राणी का नाम है ” स्त्री “!

पति ने हाथ पकड़कर बिठाना चाहा ” अरे श्रीमती जी , दो मिनट बैठकर चाय तो पियो। मगर श्रीमती जी तो इसमें भी गुस्सा दिखा बोलीं ” और काम कौन करेगा , घर की सेटिंग कौन करेगा ! श्री पति जी ये सुनकर शांत हो गए , अब आदत जो हो चली थी। बच्चों ने मम्मी को chill करने कहा ” मॉम हम कर रहे हैं न हेल्प ,बैठो न सब हो जायेगा …..पर चाय बनाम झाड़ू में ,इस बार भी झाड़ू जीत गयी ! श्रीमती जी को कौन समझाये , मॉम नहीं समझेंगी जैसे वाक्यों पर बात खत्म हुई !

पूरे परिवार के लिए चाय बनाई ज़रूर , बस अपने हिस्से का दूध और पानी डालना भूल गयी , ये सोचकर की जितनी देर चाय पीने में लगेगी ,उतनी देर में रसोई सिमट जाएगी , फिर इक्कठा सब सेट करके चाय पिऊँगी ! ये सब निपटा कर सुकून की सांस लेने का ख्वाब भला आज तक किसी का पूरा हुआ है ? जवाब है “नहीं” !

इसलिए ओ स्त्री तुम आज जियो !

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