ऑनलाइन से ऑफलाइन कक्षाओं में आती चुनौतियाँ!

ऑनलाइन से ऑफलाइन कक्षाओं में आती चुनौतियाँ!

लगभग दो वर्ष की महामारी के पश्चात विद्यालय अब पुनः खुलने लगे है | एक ओर विद्यार्थी विद्यालयों में आकर प्रसन्न हैं और अपने पुराने दोस्तों के साथ उन्हीं पुराने दिनों में लौटने लगे हैं वहीं दूसरी ओर इसके साथ-साथ विधालय मैनेजमेंट, अध्यापक गण, और अभिभावकों के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण भी है |


इस महामारी के कारण लोगों के दृष्टिकोण में बदलाव आया है | शिक्षण और प्रशिक्षण में सीखने और सिखाने की कला के आयाम अत्यधिक बदले हुए नज़र आते हैं |


ऐसी स्थिति में हम सभी नागरिकों का यह उतरदायित्व है कि हम इस प्रक्रिया में (ऑफलाइन से ऑनलाइन की प्रक्रिया में) उन चुनौतियों को अच्छी प्रकार से समझे और उसके पश्चात इसका एकजुट होकर सामना करें |


सर्वप्रथम जहाँ उच्चतर कक्षाओं के विद्यार्थी जो कि पहले से विद्यालय के वातावरण से भलीभांति परिचित थे वह इस वातावरण में आकर पुनः अपने सहपाठियों से मिलकर और अध्यापक गण के नेतृत्व में प्रसन्न है परंतु वहीं दूसरी ओर वह नन्हें विद्यार्थी

(कक्षा - नर्सरी, के जी) जिनका दाखिला इस महामारी के दौरान ही हुआ तथा जिन्हें इन दो वर्षों में विद्यालय में आने का एक बार भी अवसर ही नहीं मिला उनके लिए यह बिल्कुल एक नया माहौल है| उन्होंने तो विधालय को एक मोबाइल के जरिए जाना हैं |


इसलिए सर्वप्रथम तो विद्यार्थियों को भावनात्मक सहारे (इमोशनल सपोर्ट) की जरूरत है जिससे कि विद्यार्थी पुनः अपने आप को विद्यालय के परिवेश में ढाल सके क्योंकि विद्यार्थियों ने बहुत समय के बाद विद्यालयों में कदम रखा है और इसके लिए उनको दोबारा इस प्रणाली से जोड़ा जा सके |

य़ह समाज और विद्यालय मैनेजमेंट की जिम्मेदारी है|

एक ओर जहाँ अभिभावक अपनी संतान को विद्यालय में भेजना तो चाहती हैं परंतु साथ ही दूसरी ओर उनके मन में इस बीमारी के प्रति एक भय समाया है, ऐसे में विद्यालय मैनेजमेंट और विद्यालय के अध्यापक-गण की बहुत बड़ी जिम्मेदारी यह हो जाती है कि विद्यालय परिसर में सुरक्षा के नियम और साफ-सफाई का ध्यान रखें|

 अध्यापक गणके लिए सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण समस्या है जिसमें उनको पढ़ाने के साथ-साथ इस अतिरिक्त जिम्मेदारी को भी वहन करना पड़ रहा है | विद्यालय मैनेजमेंट और अध्यापक गण को अभिभावकों के हृद्य में विद्यालयों के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण जागृत करना एक बड़ी चुनौती है ताकि अभिभावक अपने नन्हे-मुन्ने बच्चों को विद्यालय में पुनः भेजना शुरू करे |

लगभग बीस - बाइस माह के पश्चात्‌ विद्यार्थी अपने विद्यालयों में कदम रख रहे हैं | बहुत से विद्यार्थी तो विद्यालय की समय सारणी, कायदे कानून, नियम आदि तक सब भूल गए हैं |

ऑनलाइन कक्षाओं के दौरान अधिकतर विद्यार्थियों ने अपनी विद्यालय की प्रतिदिन की दिनचर्या को भी भुला दिया है जिसकी वजह से घर बैठने से उनकी अनेक अतरिक्त प्रतिभा जैसे रीडिंग, निबंध लेखन, या करिकुलर एक्टिविटीज हो या खेल कूद उन सबके कमी आई है और यहाँ तक कि विद्यार्थियों के सोने उठने खाने के तरीकों भी बदलाव आए हैं और इसीलिए विद्यार्थियों को अब अपने स्वंय को पुनः विद्यालय के परिवेश में ढालने में अत्यंत कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा |


विधालय के माहौल में वापस से ढलने

में कुछ समय लगेगा जो विद्यार्थियों के लिए भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है परंतु जैसा कि हम जानते हैं कि मनुष्य बहुत जल्दी अपने आपको परिस्थितियों के अनुरूप ढाल लेता है|

दो वर्ष पूर्व जब यह महामारी आई थी तो हमें लगा था कि शायद हमारे बच्चे ऑनलाइन कक्षाओं में पढ़ ही नहीं पाएंगे परंतु चाहे कम या अधिक फिर भी बच्चों ने उसी के अनुसार अपने जीवन को बदला और यही एक आखिरी हमारी उम्मीद है कि हम सब लोग चाहे अभिभावक हो विद्यार्थी हो या अध्यापक गण या विद्यालय के मैनेजमेंट हो जब सब लोग मिलकर एक टीम की तरह कार्य करेंगे तो वापिस पुनः जिंदगी पटरी पर लौट आएगी |

सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण माहौल इस समय विद्यालय के मैनेजमेंट और अध्यापक गण के लिए है जिन्हें वर्तमान कक्षा के पाठ्यक्रम के साथ-साथ पिछले सालों में बच्चों की पिछड़ी हुई कमियों को ठीक करना है और साथ ही उस भय के वातावरण से उन्हें बाहर निकालने की भी कोशिश करनी है |

इस समय हमें एक अच्छे नागरिक होते हुए एक ऐसा माहौल बनाने की जरूरत है कि हम अपनी भावी पीढ़ी को सही मार्ग दिखा सके और डर और भय का वातावरण को दूर करने की कोशिश करे |

एक दूसरे का साथ दे और एक दूसरे की समस्याओं को समझते हुए एक-दूसरे के साथ सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश करे और वह दिन दूर नहीं जब विद्यालय के गलियारे फिर से खिलने लगेंगे और हम पुनः अपने विद्यार्थियों को एक मजबूत शैक्षिक नींव देने में कामयाब होंगे |

आवश्यकता है अभिभावकों और शैक्षिक वर्ग के एकजुट होकर सहयोग देने की |


# दिलसेदिलतक# पूजा अरोड़ा

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