ओजस्वी सुभद्रा जी मेरी नज़र से

ओजस्वी सुभद्रा जी मेरी नज़र से

शान्त सौम्य मुखमंडल और चारित्रिक विशेषताओं की धनी सुभद्रा जी ने अपनी लेखनी से ज्यादा प्रभावित अपनी विचारधारा से किया है मुझे उनकी देशप्रेम की भावना एक जागृती का संचार कर देती है लहू में वीरों का कैसा हो वसंत की पंक्तियाँ देखिये- 

भूषण अथवा कवि चंद नहीं,
बिजली भर दे वह छन्द नहीं,
है कलम बंधी स्वच्छंद नहीं,
फिर हमें बताये कौन हन्त
वीरों का कैसा हो वसंत।

सुभद्रा जी का जन्म नागपंचमी के दिन एक जमींदार परिवार में हुआ था उनके पिता ठाकुर रामनाथ सिंह थे जिनकी देखरेख में उनकी शिक्षा हुई। सुभद्रा जी का विवाह खंडवा के ठाकुर लक्ष्मण सिंह के साथ हुआ था जो एक सभ्य और सुसंस्कृत व्यक्ति थे। सुभद्रा जी देश प्रेम का पर्याय थीं उनकी देश प्रेम की भावना की एक झलक देखिये-

ढाल-ढालकर पिला कि जिससे मतवाला होवे संसार। साकी! आज नशे में कर लेंगे भारत माँ का उध्दार।। वह स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लेते हुए अनेक बार जेल गईं अपने सारे गहने देश के लिए दान कर दिये, उन्होंने अनेक सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया वह एक क्रांतिकारी विचारधारा वाली महिला थीं पर्दा प्रथा छोड़कर सक्रिय आंदोलनों में भाग लिया, गांधी जी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाली वह प्रथम महिला थीं,छूआछूत का विरोध किया।

उस समय सबका विरोध सहते हुए अपनी बेटी का विवाह मुंशी प्रेमचंद के बेटे से करवाया अपने भाई से स्पष्ट कह दिया आपके सुयोग्य वर की परिभाषा और मेरे सुयोग्य वर की परिभाषा में अन्तर है भैय्या यदि यह विवाह स्वीकार हो तो भाई के रिश्ते से आ जाना नहीं तो वहीं से आशीर्वाद दे देना, यह वाक्या सुभद्रा जी के दृढ़ व्यक्तित्व का परिचायक है।

एक और वाक्या आपको बताती हूँ जो मुझे विस्मित करता है और उनके प्रति श्रद्धा से भर देता है कन्यादान की प्रथा का विरोध करते हुए उन्होंने कहा मैं कन्यादान नहीं करूँगी, क्या मनुष्य मनुष्य को दान कर सकता है? विवाह के बाद मेरी बेटी मेरी नहीं रहेगी? उस समय तो छोड़िये आज जब स्त्रीयाँ आधुनिकता का नारा बुलंद कर रही हैं।

मुझे नहीं लगता कोई स्त्री ऐसी बात कह सकती है यह सुभद्रा जी की मानसिक परिपक्वता का ज्वलंत उद्धाहरण है। उनके यही गुण और कार्य उनकी गणना विदुषी महिला के रूप में कराते हैं। 'मैंने हँसना सिखा है मैं नहीं जानती रोना' कहने वाली सुभद्रा जी सामने वाले को भी हँसने पर विवश कर देती थीं। उनकी बचपन की सहेली महादेवी वर्मा जी से ज्यादा उन्हें कौन जान सकता है उन्होंने सुभद्रा जी के विषय में लिखते हुये कहा कि एक बार मृत्यु के सन्दर्भ में बात हो रही थी तो सुभद्रा ने कहा 'मैं तो मरने के बाद भी धरती नहीं छोड़ना चाहती।

मैं चाहती हूँ मेरी समाधि के चारों तरफ बच्चे खेलते रहें स्त्रियां गीत गाती रहें मुझे तो यह शोर और आनन्द बहुत भाता है' इससे पता चलता है कि वह कितनी जीवन से भरपूर महिला थीं जो मृत्यु के बाद भी आनन्द की कल्पना कर रहीं थीं उनकी तस्वीर में भी उनके चेहरे पर एक आत्मिक मुस्कान और ठहराव का अनुभव होता है।महादेवी वर्मा जी उनके बारे में कहती हैं अपने को बड़ा बनाने के लिए दूसरे को छोटा बनाने की भावना अक्सर प्रतियोगियों में दिख जाती है लेकिन सुभद्रा इस सम्बन्ध में भी बहुत उदार थीं।

साथी साहित्यकारों और समीक्षकों ने उनके व्यक्तिगत गुणों को बहुत सराहा है यह एक इन्सान के रूप में बहुत बड़ी उपलब्धि है,सुभद्रा जी के इसी रूप ने मुझे बहुत प्रभावित किया उन्हें बारम्बार नमन ।

जन्म-मृत्यु- 1904 - 1948
कहानी संग्रह - बिखरे मोती, उन्मादिनी, सीधे साधे चित्र
कविता संग्रह - मुकुल,त्रिधारा 
    
~सुमेधास्वलेख, 
स्वरचित, मौलिक।
#इतिहासकेपन्नोंसेमेरीमनपसंदलेखिका

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