पिघलता वक्त

पिघलता वक्त



वक्त - वक्त की बात है , ना जाने कब क्या मोड़ ले ले ये वक्त ,
रेत तो ठहर जाती है पर भर के लिए हाथों में वक्त निकल जाता है पानी की तरह ,
जैसे पानी नहीं ठहर सकता हाथों में , वक्त भी कहां ठहरा कभी किसी के लिए ।

क़िस्मत के पेड़ पर टंगा वक्त ना जाने कितने रंग दिखाता है,
कहीं पिघलता शनै:-शनै: , कहीं पलक झपकते ही निकल जाता,

अमीर का वक्त ठहरा उसी पेड़ पर खुशियों के फूल खिला देता,
ग़रीब का वक्त पतझड़ की तरह सुखे पेड़ सा ना जाने कब टहनी से बिछड़ जाता,

बचपन का वक्त भी कहां ठहरता, पल में पिघल कर बचपन को निगल जाता,
जवानी का वक्त आता तो वो पिघलना शुरू हो जाता,।

मगर बुढ़ापे का वक्त ना जाने क्यों पिघलता धीरे-धीरे,
धीरे-धीरे ही टपकता बूंद-बूंद सा, जो तकलीफ़ देह बन जाता,
ना जाने सबका वक्त एक सा क्यों नहीं होता, किसी का दर्दीला तो किसी का सुनहरी यादें छोड़ जाता।

प्रेम बजाज ©®
जगाधरी ( यमुनानगर)

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