प्रेम की पराकाष्ठा

प्रेम की पराकाष्ठा

कभी कभी ख्यालो में खोयी हुई मैं सोचती हूँ ,

क्या होगी इस प्रेम के महीने में किसी के प्रेम की पराकाष्ठा,


शर्तरहित अनअपेक्षित प्रेम , अंतहीन इंतज़ार , फिर मिलन की आस ,

हो गर किसी के प्रेम में ये पड़ाव , जो साबित करें हाँ आसान प्रेम कहाँ होता है , प्रेम कठिन परस्थिति में पनप कर फले फुले तभी तो असल मायने में प्रेम होता है ,

यही प्रेम बेहद खूबसूरत है, जो सबसे पवित्र प्रेम की पराकाष्ठा है,


जब ज्ञात हो मन में उपजे प्रेम के बीज का जवाब

प्रीतम तक पहुंचेगा की नहीं ,

उनका मन प्रेयसी के प्रति विचलित होगा भी या नहीं ,

ऐसे प्रेम में जहां असमंजस्य है , इंतेहा ए इंतज़ार है,

आसान कहाँ था एक जोगी के प्रेम को पाना ,

आसान कहाँ था उनके मन में प्रेम की अलख जगाना,

आसान कहाँ था शिव से प्रेम करना ,

आसान कहाँ था सती से पार्वती तक के सफर को चुनना ,


मेरी सोच को विराम मिला ,

जब शिव - शक्ति का " वो खास दिन "

हमे शिवरात्रि के रूप में मिला ,

बरस रहे थे पुष्प हज़ारों आकाश से ,

शिव शक्ति का जब गठबंधन हुआ ,

चाहना चाहती हूँ तुम्हें भी माँ गौरी की तरह ,

तुम भी मेरे साथ शिव सा प्रेम निभा जाना ,

मैं हर जन्म इंतज़ार करुँ ,

और अंत में आप मुझे मिल जाना !!






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