प्रेमिका की पाती!#अनोखी चिट्ठी

प्रेमिका की पाती!#अनोखी चिट्ठी


प्रिय चाय,

तुम कैसी हो? आशा करती हूं की तुम हमेशा की तरह कड़क और गर्म ही होगी। मैं भी ठीक हूं, तुम्हें बहुत याद करती हूं।

अम्मा (दादी)को गए आज पूरे दस साल हो गए और अम्मा के साथ ही तुम भी मुझसे जुदा हो गई।

नहीं नहीं!! चाय तो मम्मी भी बनाती हैं पर अम्मा के हाथ वाली बात कहां!!


आज फिर माघ की कड़ाके की सर्दी के बाद बसंत की गुलाबी धूप आंगन में खिली हुई है, तुम आज फिर मुझे बहुत याद आ रही हो।

याद है मुझे कैसे अम्मा तड़के उठ जाती थीं, बटलोई (पतीला) में लेवा (राख की एक परत जो बर्तनों पर लगाई जाती है जिससे वो चूल्हे पर चढ़ाने से जलें नहीं) लगाती थीं, फिर चूल्हे में उपरी (कंडा) और लकड़ी से आग जलाती थीं, आह! वो प्यारी नारंगी आग की लपट और धुएं की सोंधी महक! उस पर बटलोई में तुम्हारा खौलते हुए उफ़ान पर आना अगर जल्दी ही फूंक मारकर या कलछी से हिलाकर तुमको शांत न करतीं अम्मा तो तुम तो कूदने को उतारू ही थी ?


कभी सोंठ, कभी अदरख तो कभी तुलसी के साथ मिलन से तुम्हारा स्वाद और भी निखर जाता था। सर्दियों में गुड़ के साथ तुम्हारा मिलन उसी प्रकार से आनंद की अनुभूति देता जैसे की कोई प्रेमी युगल एक दूसरे को बाहों में भरकर रोमांचित होते हैं।

आग से निकला धुआं तुममें ऐसे समा जाता था जैसे की प्रथम मिलन पर बिहारी की नायिका अपने नायक के बाहों में समाती हो।

अब तुम एकदम तैयार थी मेरे होंठों को छूने के लिए, कभी चीनी मिट्टी के कप तो कभी स्टील की छोटी गिलसिया (छोटा गिलास) में अम्मा तुमको छान कर मेरे पास ले आती थीं, मैं पहले तो तुमको जी भर निहारती, फिर तुम्हारी मदहोश करने वाली सुगंध को अपनी सांसों में समाहित होने देती और फिर घुट - घुट कर तुम्हें अपने अंदर ले लेती थी। तुम्हारा एक - एक बूंद अमृत के रसपान से कम न था मेरे लिए।


वो सोंधी महक, वो कत्थई रंग,वो गर्म भाप और वो तुम्हारी गर्माहट की अनुभूति से ही मेरा रोम - रोम सिहर उठा आज फ़िर से।

तुमसे मिलने को फिर से आतुर, तुम्हारे प्यार में व्याकुल मैं हर सुबह तुम्हारा इन्तजार करती हूं। एक दिन तो \"अम्मा के हाथ की चाय\" बनाकर ही दम लूंगी और तुम्हें दोबारा पाकर ही रहूंगी।


"बसंती धूप ने आँगन में ली फिर से अंगड़ाई,

आज फ़िर तुम्हारी याद में आंख भर आई।"


तुम्हारी विरह में आंसू बहाती ...

!! एक चाय प्रेमिका!!

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