पुरुषार्थ का कोई पर्याय नहीं

पुरुषार्थ का कोई पर्याय नहीं

कभी-कभी दौड़ती भागती ज़िंदगी से विराम लेकर शांत चित्त से ये सोचना चाहिए कि जो जितना हमने कमाया या जो हमारे पास है उसका मज़ा हम सुकून से ले रहे है? अगर जवाब हाँ मिले तो आपके जैसा किस्मत वाला कोई नहीं। जो सुख दौड़ धूप करके मेहनत से कमाया है उसे आनंद लेकर मजे से भोगना चाहिए। कुछ लोग हर काम में माहिर होते हुए भी नसीब के सहारे बैठे रहते है, ज़रा से संघर्ष से थककर बोल देते है मेरा नसीब ही खराब है। नसीब कोई जादुई चिराग नहीं जो खुल जा सिमसिम बोलते ही खुल जाएगा।

नसीब और लकीरों की बात नहीं धूप में हम कितने जले उसका हिसाब कीजिए। लकीरें और सितारे अपनी चाल बदलते रहते है, कभी धूप तो कभी छाँव देना ज़िंदगी की फ़ितरत है। याद वही रखें जो अपना पसीना बहा कर मंज़िल के कितने करीब पहुँचे हम। कितना कमाया और कितना भोग पाए।

बहुत कुछ ज़िंदगी में अचानक होता है कभी-कभी बेइन्तहाँ मेहनत भी बेकार जाती है, तो कभी थोड़ी सी मशक्कत सफ़लता के झंडे गाड़ देती है। कभी हमें लगता है की वाह अब ज़िंदगी में कोई कमी नहीं सब सेट हो गया है, इतने में कुछ ऐसा घट जाता है की बना बनाया सब तीतर-बितर हो जाता है। तो कभी बहुत आसानी से ज़िंदगी हमारी मुठ्ठी में खुशियाँ थमा देती है, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होती वह चमत्कार हो जाता है। तब हम सोचते है हमने तो ऐसा सोचा भी नहीं था नसीब, लक, किस्मत जैसा भी कुछ होता है क्या?

हम कामयाबी, निष्फलता, सुख-दु:ख, प्यार, दुश्मनी, दोस्ती सारी चीज़ों को किस्मत के साथ जोड़ लेते है। कुछ भी बुरा होने पर लोग बोलते है मेरी तो किस्मत ही खराब है, और कामयाबी पर इतराते हम सारा श्रेय खुद की मेहनत को देते है।

अजीब आदत है हम इंसानों की जो हमारे पास है उसकी कद्र नहीं होती, दूसरों के नसीब से तुलना करते जो नहीं है उसके अफ़सोस में दु:खी होते रहते है। और कभी अपने से निम्न और दु:खी लोगों को देखते है तब सोचते है अरे हम कितने किस्मत वाले है उपर वाले ने इतनी सुख सुविधा दी है जो हर किसीके नसीब में नहीं। सोचिए जो आज हमारे पास है उसकी हमने कभी कल्पना भी की थी।

प्रारब्ध और पुरुषार्थ एक दूसरे के साथी है, सबकुछ किस्मत के भरोसे छोड़ देने से कामयाबी खुद चलकर आपके पास नहीं आएगी। ढूँढनी पड़ती है सफलता ज़िंदगी के बिहड़ जंगलों में किसी अन्जान दरवाज़े के पीछे छुपी होती है, जो दरवाज़ा मेहनत और पुरुषार्थ की चाबी से ही खुलता है। इंसान चाहे तो अपनी मेहनत और सुजबुझ से सितारों की चाल बदलकर लकीरों में किस्मत की रोशनी भर सकता है। आत्म मंथन जरूरी है। किस्मत के भरोसे न रहकर खुद की काबिलियत पर यकीन करते आगे बढ़ेंगे तो एक दिन सफलता सामने से आपको ढूँढती हुई मिलने आएगी।

भावना ठाकर \"भावु\" (बेंगलोर, कर्नाटक)

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