प्रथा.. जो अपनों को भी गैर कर दे #BreakTheBias

 प्रथा.. जो अपनों को भी गैर कर दे #BreakTheBias

ससुराल गांव में था। शादी के बाद जब ससुराल पहुंची तो वहां के रीति -रिवाज़ मुझे अक्सर परेशान करते। मै शहर में पली - बढ़ी थी। मेरा मायका इतना रूढ़िवादी नहीं था। जितना ससुराल था। कारण गांव में सभी रिश्तेदार थे। कहने को हर घर से कोई ना कोई विदेश में था। पर जब वे भारत आते, तो यहीं के रीति -रिवाज़ मानते। इसलिये वहां परंपरा के नाम पर रूढ़ियों को खूब पाला -पोसा जाता था। घूँघट की मै अभ्यस्त नहीं थी। मेरे मायके में मेरी भाभियाँ घूँघट नहीं करती थी। माँ के कहे अनुसार संतुलन बनाने के चक्कर में मै प्रतिवाद नहीं कर पाती थी। घूँघट में मुझे ठीक से दिखता नहीं था। कई बार ठोंकर खा मेरे पैर का नाख़ून जख़्मी हो चुका था।


करीब एक साल बाद में पति के पोस्टिंग वाली जगह पर गई। घूँघट से आजादी तो मिल गई। पर ससुराल से जब भी कोई आता था. तब साड़ी पहननी पडती थी, सर पर पल्ला भी रखना पड़ता था। एक दिन, वहाँ पति के रिश्ते के चाचा जी आये। उनके घंटी बजाने पर, मैंने दरवाजा खोल दिया. सामने अपरिचित चेहरा देख मै डर गई। जोर से दरवाजा बंद कर दिया। बाहर से आवाज आती रही... मै तुम्हारा चाचा ससुर हूँ। पर मैंने उन्हें कभी नहीं देखा, ना उन्होंने घूँघट की वजह से मुझे देखा था.। पति ऑफिस से लौटे नहीं थे। रात के नौ बज रहे थे, मैंने सोचा ये पक्का बदमाश हैं, सब पता करके आया होगा। दरवाजा तो नहीं खोलूंगी। उन दिनों मोबाइल नहीं हुआ करते थे। तभी थोड़ी देर में पति आ गये। उनके आने पर मैंने दरवाजा खोला तो पीछे फिर वही अपारचित चेहरा खड़ा था। जब तक मै कुछ बोलती, पति ने बात संभाल ली।ये चाचा जी हैं।चाचा जी ने मुझे कहा -बहू आज तो तुम पिटवा दी होती। मै शर्मिंदा हो गई। सोच लिया बस अब और घूँघट नहीं करना हैं। ऐसे घूँघट से फायदा क्या जो रिश्ते ही ना पहचान सके।ऐसे पर्दे से क्या फायदा जो रिश्तों को ही अनजान कर दें।सम्मान तो आँखों में होती हैं। ये बात समझ,थोड़ा देर से ही सही, घूँघट प्रथा को तोड़ ही दिया। फिर आने वाली बहुओं को भी आराम हो गया।


रीति -रिवाज़ को तोडना आसान नहीं होता हैं। वो भी गांव में, जहाँ अपनी सोच होती हैं। आवाज कोई उठाये, थोड़ा गुस्सा और आलोचना तो झेलनी पडती, पर अंत सुखद ही होता।


 ---संगीता त्रिपाठी

#Break The Bias,

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