परिवार की अहमियत- एक माँ का अनुभव

परिवार की अहमियत- एक माँ का अनुभव

कृष्णा आंटी और मुरली अंकल मेरे पड़ोस में रहने आए। मैं गीता शर्मा और पति विनोद शर्मा। पति बिजली विभाग में कार्यरत है। मुरली अंकल का यहां तबादला हुआ।

मैं सुबह की चाय लिए उनके घर का दरवाजा खटखटाई।देख आश्चर्य हुआ आंटी तो नहा चुकी थी और किचन में ही एक स्लैब पर भगवान का फोटो रख दीया जला चुकी थी।


साथ बैठ चाय पिया और दोपहर के खाने का आमंत्रण दे आई। मुरली अंकल के रिटायरमेंट में अभी 5 साल और है ।बेटा अपने परिवार सहित बेंगलुरु में और बेटी अपने परिवार सहित हैदराबाद में रहते हैं।

आंटी भी प्राइवेट स्कूल में कार्यरत हैं। बातों बातों में उन्होंने बताया बच्चों की खातिर उन्होंने सरकारी नौकरी नहीं की क्योंकि कहां पोस्टिंग होगी कहां तबादला होगा कहा नहीं जा सकता! जीवन में मैंने अपने परिवार को ही प्राथमिकता दी है। इतनी महत्वाकक्षी नहीं कि परिवार की खुशियों को दांव पर लगा देती ।जब तक सास जिंदा थी नौकरी करती रही। सास के गुजरने के बाद नौकरी को तिलांजलि दे दी।

आंटी का कहना था आराम से बैठ कर दो सूखी रोटी खाना ज्यादा उत्तम है वनस्पत दौड़ते हुए दो पराठे खाना।

शाम को पति के साथ बच्चों को पार्क भेज दो घंटे के लिए एक कोचिंग में जाया करती थी। अपना आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता बनाए रखना भी जरूरी था ।


जब बच्चे स्कूल जाने लगे तो फिर से बच्चों के साथ स्कूल जाने लगी। अंकल के ट्रांसफर के साथ साथ कभी नौकरी करती तो कभी नहीं। प्रतियोगिता में सबको पीछे छोड़ जीतने की ललक बच्चों में कभी पैदा नहीं की।" हमेशा सबको पछाड़ आगे बढ़ने वाला रिश्तो के मूल्यों को नहीं समझता "आंटी का कहना था।


हर साल बच्चे गर्मी की छुट्टियों में और माता-पिता की शादी की सालगिरह पर परिवार समेत अवश्य आते ।

गीता की मुलाकात बच्चों से भी हुई। माता पिता के त्याग और बलिदान को बच्चे कभी नहीं भूलते" हमारे उज्जवल भविष्य के लिए उन लोगों ने अपनी इच्छाओं की तिलांजलि दे दी। उनकी खुशियों को दुगुना करना ही हमारा उद्देश्य है। दुनिया के किसी भी कोने में क्यों ना हो सालगिरह पर ना आने का सवाल ही नहीं होता" बेटी ने कहा।


"कभी पढ़ाई को लेकर हम पर दबाव नहीं रहा। बच्चों को समझने वाले माता-पिता पा हम तो धन्य हो गए" ।बेटी बोली," हर जन्म में यही हमारे माता-पिता बने"।

बच्चों ने परिवार के मूल्यों को, रिश्तो की अहमियत को समझा।

निश्चित रूप से यह कृष्णा आंटी और मुरली अंकल के परवरिश का ही नतीजा था गीता मन ही मन सोची।


" भले कृष्ण आंटी जैसे मैं ना बन पाऊं पर मैं कोशिश तो कर सकती हूं। गीता ने मन ही मन निश्चय किया।


#राइटिंग चैलेंज#मेरा अनुभव

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