'पीरियड हैं तो स्वस्थ हैं '

'पीरियड हैं तो स्वस्थ हैं '

#period talks


समय के अनुसार समाज में बदलाव के कारण पीरियड के बारे में आज बात करना बहुत सहज हो गया है ।इसमें शिक्षा, फिल्म इंडस्ट्री , ऐडवर्टाइज़िंग तथा खुलकर बात करने की मानसिकता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है ।


पुराने समय में शिक्षा के अभाव के कारण मुख्यतः औरतों को कोई बात सिखानी हो या उनसे करवाना हो तो उसे धर्म से जोड़ दिया गया,कि पीरियड के टाईम में नहाना नही होता और नहाएंगे नहीं तो किचन में नहीं जाना,पूजा नहीं करनी, यह सब कहकर पाबंदियां लगाई गई और सच्चाई से परिचय नहीं कराया गया, कि यह एक शारीरिक प्रक्रिया है । परंतु जैसे-जैसे समाज में बदलाव आया,लड़कियाँ भी पढ़ने और आत्मनिर्भर बनने लगी ।उनके भी ज्ञान चक्षु खुले तो पाया कि यह एक स्वस्थ महिला के शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया है तो मन की सारी शंकाएँ मिटने लगी । पढी लिखी महिलाओं ने धीरे धीरे इस बारे में बात करना शुरू किया ।


इन सब बातों में हमारे समाज में आये बदलाव का भी बहुत योगदान रहा जैसे पहले संयुक्त परिवार होते थे तो यह सब बातें सम्भव हो जाती थीं परंतु शहरी करण के दौर में एकल परिवार का युग आया तो यह सब बातें निभाना सम्भव ही नहीं था ।धीरे-धीरे मजबूरी में ही सही,मानसिकता बदलने लगी ।


sanitary napkins के विज्ञापन देख कर कुछ लोगों ने इस्तेमाल करना शुरू किया और जैसे-जैसे बढ़े हुए तो इस प्रक्रिया का वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी समझ आया ।साथ साथ शारीरिक स्वच्छता का महत्व भी समझ आया तो पीरियड के दिनो में नहाना शुरु किया ।कपड़े की जगह पैड का इस्तेमाल करना शुरू किया । उन दिनों हाथों की और शारीरिक स्वच्छता का ध्यान ज्यादा रखा । थोड़ा पुरानी मान्यताओं के अनुसार, मन्दिर गये तो दूर से ही हाथ जोड़ दिया कि पुरानी प्रथा को भी ठेस ना पहुचें । बाकी हर समय नॉर्मल रहने की आदत डाली और कार्य में व्यस्त रहते हुए नॉर्मल लगने भी लगा ।

दिमाग में यह भी समझ आया कि यह एक नेचुरल प्रक्रिया है ।इसके समय से होने से हम ठीक है अन्यथा कोई परेशानी है ।

पूनम सेहरा

14/196 राज नगर ग़ज़ियाबाद

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