पोषण का हक #BreakThe Bias

पोषण का हक #BreakThe Bias

बात आज से लगभग तीस साल पुरानी है,जब हम एक छोटे कस्बे में अपनी दादी के साथ रहा करते थे..... 


सर्दियों का मौसम था घी, सौंठ की महक घर के बाहर तक पहुंच रही थी, तो सोचो घर के सदस्यों के मुंह में पानी कैसे ना आता मेरी दादी हर साल कूट-कूट कर मेवे, गुड़, इलायची डालकर लड्डू बनाती थी। कहती सर्दियों में ताकत और पोषण की बहुत जरूरत होती है। कुछ घंटों में लड्डू बन कर डब्बे में भर दिए गए और ताला डालकर दादी के कमरे की अलमारी में बंद हो गए।


सभी को पता था यही होता है हर साल पर कुछ महीनों पहले आई रूपा चाची को यह बात पता नहीं थी। वह इतनी अच्छी खुशबू से यह सोच बैठी थी...."आज तो खाने में लड्डू मिलेंगे" रात को खाना खाया गया तरीके अनुसार जब घर के आदमी लोग यानी दादा जी, पापा, चाचा खाना नहीं खा लेते तब तक घर की महिलाएं खाना नहीं खाती थी!


रूपा चाची परस करते समय देख रही थी सभी की थाली में लड्डू भी परसे गए हैं और वे बेसब्री से खाने का इंतजार कर रही थी। आखिर दादीजी, मां, चाची खाना खत्म कर उठने लगी पर लड्डू थाली उठने के बाद भी नसीब ना हुई ये देख रूपा चाची आश्चर्य से बोली "गुड़िया (सात साल वर्ष) (मुझसे) यह लड्डू की जगह गुड क्यों परस दिया हमें...??????


मैंने उन्हें साफ कह दिया लड्डू तो सिर्फ उन लोगों के लिए बनते हैं...."औरतें खाती हैं तो तबीयत बिगड़ जाती है" रूपा चाची आश्चर्य सी वहीं खड़ी रही उन्हें समझते देर न लगी कि घर में पुरुष और महिलाओं के बीच भेदभाव होता है। क्योंकि दादी घर की औरतों को दूध भी नहीं पीने देती थी।

नई नवेली होने के कारण तब तो चाची कुछ नहीं बोली लेकिन आज उनसे चुप ना रहा गया "मांजी यह लड्डू खाने को हमें कब देंगी...?????

दादी गुस्से से बोली "बहु यह लड्डू ताकत के होते हैं और केवल पुरुषों के लिए बनाए जाते हैं" वे घर से बाहर जाते हैं, मेहनत करते हैं और वैसे भी हम औरतें घर में ही रहती हैं हमें यह मेवे पचेंगे नहीं बीमार पड़ जाएंगे सो अलग...!!!!! (बताते हैं दादी की सास बहुत खतरनाक थी बेटे बहू में गजब का भेदभाव करती थीं शायद वही अब दादी करने लगी थी)


चाची बोली "मांजी यह बातें इस बच्ची को बहलाने के लिए काफी होंगी पर मैं सब समझती हूं"..... आप को भी मालूम है हम घर में कितना काम करती हैं सुबह 4:00 बजे उठकर पूरे घर का झाड़ू पोछा, रोज चक्की चला कर ताजा आटा पीसना, मसाले भी सिलबट्टे पर रोज पीस, चूल्हे पर रोटी बनाना, कुए से पानी लाना और भी ना जाने क्या-क्या...???

तुम अब अपनी सास से जबान लड़ाओगी...!!!??


नहीं मां जी आपको बुरा लगा हो तो माफ करिएगा हाथ जोड़कर बोली "मेरे मायके में खाने पीने में ऐसा भेदभाव नहीं देखा" जो घर के पुरुष को दिया जाता वहीं महिलाओं को बराबर दिया जाता था। यहां यह सब देखा तो सहन नहीं हुआ..... चलो आप हमें नहीं इस छोटी बच्ची को तो दे सकती हैं कल को यह बड़ी होगी महीने से होगी इससे पोषण की बहुत जरूरत है वरना खून की कमी होना लाजमी है।( इधर मेरी मां चाची को लगातार चुप रहने को बोल रही थी)


दादी चाची की बहस सुन सभी लोग इकट्ठा हो गए तब दादाजी बोले "संतोष बहुत हुआ बहू सही कहती है"....बड़ी बहू ने लिहाज़ के कारण तुम्हारी बातों का विरोध नहीं किया इसका मतलब यह नहीं सब गलत बातों को सभी मान लेंगे रूपा बहू सही कहती है। घर हो या बाहर मेहनत सभी को बराबर लगती है, तो पोषण भी बराबरी से मिलना चाहिए...!!!


इतना सुनते ही दादी गुस्से से कमरे में चली गई सभी चुपचाप अपने कमरों में जाने लगे..... रुको छोटी बहू ये डिब्बा रसोई में रख दो और तुम अभी तीनों एक लड्डू निकाल कर खा लो...!!!!

रूपा चाची ने फटाफट एक लड्डू निकाला दादी के मुंह में रख दिया "मांजी आपको भी पोषण की उतनी ही जरूरत है जितनी हम सबको"...!!!!

मैं भी लड्डू खाते हुए बोली "दादी अब आपके पैरों का दर्द भी चला जाएगा यह ताकत के लड्डू खाकर.... दादी की आंखों में पश्चाताप के आंसू थे।

अब मेरी दादी इस दुनिया में नहीं है गठिया की बीमारी से 56 की उम्र में चल बसी मुझे याद है "पैरों में दर्द के कारण हमेशा एक तखत पर बैठी रहती थी"..... कड़क मिजाज थी पर मुझे प्यार बहुत करती थी!!!

भगवान का शुक्र है आगे जाकर मुझे अपने ससुराल में ऐसा भेदभाव देखने को मुझे नहीं मिला, पर अपनी चाची से "गलत बात पर अपना पक्ष रखने की शिक्षा जरूर मिली"....!!

 आप नारी हैं सिर्फ इसलिए कोई अन्याय,भेदभाव सहेंगी नहीं..... हम स्त्रियां अपने विचारों, पसंद, नापसंद खुद तय करने की शक्ति रखती हैं क्योंकि हम शक्ति स्वरूपा हैं...!!!!

कनार शर्मा✍️

महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!!

#BreakTheBias

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