#PeriodTalks माहवारी:अछूत नहीं है नारी

#PeriodTalks माहवारी:अछूत नहीं है नारी


पीरियड्स या माहवारी स्त्री में एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है परंतु हमारे समाज में इसे लेकर एक "टैबू"अभी तक बना हुआ है।


अब समाज में पीरियड और उससे संबंधित परेशानियाँ और स्वच्छता को लेकर जागरूकता आ रही है लेकिन अभी भी यह कुछ बड़े और मझोले शहरों तक ही सीमित है।गाँव में अभी भी बहुत से नियम और वर्जनाएँ हैं ।


मैं जब पहली बार पीरियड से हुई तो माँ ने कपड़ा तहकर के दिया कि अब हर महीने तुम्हें पीरियड होगा और तुम्हें पाँच दिन रोज कपड़ा प्रयोग करना है और अगले दिन धोकर सुखाना है।सेनेटरी नैपकिन भी थे लेकिन हमारी पार्टी ड्रेस की तरह,मतलब माँ कहती थी कि जब कहीं बाहर जाना हो तब ही इन्हें प्रयोग करना।कुछ समय बाद यह स्थिति बदली और सैनिटरी नैपकिन का ही प्रयोग रेगुलर किया जाने लगा। जिन्हें मम्मी ही खरीदकर लाती थीं और हमेशा काली पॉलिथीन में ही आता था।मेरे घर में मासिक धर्म के समय पूजा करना वर्जित था।मसाले,घी,अचार, पापड़ छूने की भी मनाही थी।दादी कहती थी कि पापड़ मत छूना वरना लाल हो जाएँगे।जब उनसे कारण पूछती तो कहती थी पता नहीं लेकिन बड़े लोग कहते हैं।


जब शादी हुई तो ससुराल में,मासिक धर्म को लेकर बहुत सारे नियम थे।मैं पति के साथ दूसरे शहर में रहती थी पर सच कहूँ तो सब नियमों का पालन किया।पर जब बेटी हुई तो मैंने एक बार तसल्ली से सासू माँ को समझाया कि "मम्मी जी,माहवारी ना हो तो सृष्टि मेंं स्जन कैसे होगा? मासिक धर्म में स्त्री अछूत नहीं होती।पुराने समय में स्त्रियाँ चौबीसों घंटे काम में लगी रहती थीं।पहले औरतें हाथ-चक्की से आटा पीसती थी,सिल-बट्टे का प्रयोग होता था,कुएँ से पानी भरती थी,तो मासिक धर्म के समय उन्हें आराम देने हेतु ये नियम बने।अब समय बदल गया है महिलाएँ स्कूल,ऑफिस भी जाती हैं और तकनीक के कारण शारीरिकश्रम भी पहले से कुछ कम हो गया है इसलिए हमें भी बदलना होगा।"


सासू माँ को यह बात कितनी समझ आई वह पता नहीं लेकिन अब कुछ चीजों की छूट उन्होंने जरूर दे दी और आशा करती हूँ धीरे-धीरे अपनी पोतियों के लिए वह थोड़ी और उदार भी हो जाएँगी।

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