एक औरत ही घर को स्वर्ग और नर्क बनाती है ?

एक औरत ही घर को स्वर्ग और नर्क बनाती है ?

इस सप्ताह गुलाबी चर्चा का विषय था - क्या आपको नहीं लगता सारी जिम्मेदारी एक औरत पर ही डाल दी गई ,घर के बाकी सदस्यों का क्या ? क्या उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है ? एक औरत ही घर को स्वर्ग और नर्क बनाती है ?इस कहावत पर हमने पिंक कॉमरेड्स को अपने विचार रखने के लिए कहा , इस लेख में हम शामिल कर रहे सर्वश्रेष्ठ १२ विचारों को , महिलाओं के प्रति  समाज के दोगलेपन को बहुत ही बेबाकी से लिखा गया है -

Ruchi Mittal
शायद ये कहना चाहता हो समाज... कि औरत से ज़्यादा धैर्यता, सहनशीलता और पॉजिटिव नज़रिया किसी का नहीं हो सकता... हमारे भारतीय समाज में देवी की उपाधि दी गई है उसे... लेकिन इस सच्चाई को स्वीकारने में भी उनको अपनी बेज्जती लगतीं है..क्योंकि इस सोच के पीछे भी सबकी अलग अलग मानसिकताएं काम करती हैं... सकारात्मक से ज़्यादा नकारात्मक... क्यूँकि हर अच्छे बुरे का दोष उसपर ही मढ दिया जाता है...और ये सब तय करने वाले समाज के कथित ठेकेदार जो अपने घर की स्त्रियों को दोष देने से भी पीछे नहीं हटते..
Ruby Jain
घर मतलब औरत. .. आप चाहे वर्किंग हों या न पर घर चलाने का जिम्मा हमारे देश में काफी हद तक महिलाओं का है..और ये एकरसता तब तक कायम रहेगी जब तक खुद महिलाएं इसे बदलने के लिए मजबूत नहीं बनेंगी..इस विचार धारा को बदलने के लिए अभी से अपनी पीढ़ियों में बराबरी के बीज बोने होंगे..वरना हम ऐसे ही इस विषय पर विचार विमर्श करते रह जाएंगे। 
Mamta Gupta
ऐसा कहने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि एक मकान को घर औऱ घर को मंन्दिर एक स्त्री ही बनाती हैं,हर बार अपनो का सानिध्य पाने की कोशिश करने में लगी रहती है, लेकिन उसे मिलता क्या है हर वक्त नकारात्मकता टिप्पणियाँ।ना जी ना घर वालो से तो कभी कोई गलती होती ही नही है, अगर दूध भी फट जाए तो उसमें भी एक स्त्री की गलती निकालकर देते हैं।।
बाहर के लोगो की तो बात तो बाद कि है,घर के लोगो ही बात का बतंगड़ बनाकर बाहरी लोगों तक बात पहुचाते है, गैर जिम्मेदार हैं, फलाना ढिकाना।जबकि घरवालों की ज़िम्मेदारी बनती हैं कि,छोटी छोटी गलतियों पर घर की स्त्रियों नीचा न दिखाए। आखिर वो भी इंसान हैं।
Manjeeta Rajput
मेरे विचार से,घर का स्वर्ग या नर्क बनना किसी एक सदस्य पर निर्भर नही करता है। लेकिन चूंकि परिवार की सभी जिम्मेदारियां एक स्त्री पर लाद दी जाती है, इसीलिये उसी के गलत-सही का आंकलन अधिक किया जाता है।लेकिन इसे बदलने की सख्त जरूरत है।परिवार सबका तो जिम्मेदारियां भी सबकी ही होनी चाहिये।
Vani Rajput
इसका मतलब मुझे लगता है कि यहाँ सोच की बात हो रही है कि एक स्त्री सारी जिम्मेदारी उठाते हुए संतुष्टता वाली सोच से घर को स्वर्ग और नरक बनाती है। मगर यहाँ समाज बस केवल एक तरफा बात कर रहा है जबकी घर परिवार के हर सदस्य की जिम्मेदारी बनती है मगर ये दोगला समाज कुछ नहीं समझता और सारा दोष औरत के ऊपर मढ़ता है। 
Rinki Pandey
एक औरत त्याग ,समर्पण की देवी कहलाती है वह परिवार को चलाने में अपनी इच्छाओं का पल पल त्याग करती हैं चाहे परिस्थति कैसी भी हो पर जब जब परिवार में कुछ बुरा होता है तो सब कुछ मढ़ दिया जाता है औरत के सिर पर और उसे बुरा भला कहा जाता है इसका जीता जागता उदाहरण मैं खुद हूं | लोगों का क्या है एक औरत के लिये कुछ भी कहने से पीछे नहीं हटते यहां तक की कभी कभी कुछ पुरूष अपनी पत्नी के स्वाभिमान के लिये भी आवाज नहीं उठाते बस उस वक्त यह कह दिया जाता है कि बात को बढ़ानी नहीं चाहिये और जैसा कि एक औरत के लिये कहा जाता है कि वह ही घर को स्वर्ग बना दे या नरक | सबका जिम्मा औरत ने ही अपने कांधों पर उठाया है न् यह कहकर उसे चुप करा दिया जाता है |
Yasmeen Ali
एक व्यक्ति से परिवार नहीं बन सकता , माता-पिता और उनके बच्चे सभी परिवार का महत्वपूर्ण अंग होते हैं हर किसी की अपनी भूमिका होती है परिवार में और जिन परिवारों में सब अपने दायित्वों, कर्तव्यो का निर्वहन सही ढंग से करते हैं वहां खुशहाली और सौहार्द होता है, केवल औरत के उचित-अनुचित व्यवहार को परिवार के स्वर्ग-नरक बनाए जाने की सोच पुरातन है, जहाँ महिलाओं को सम्मान, उनके अधिकार देने में कोई पक्षपात नहीं किया जाता है नि :संदेह वहां क्लेश पैदा नहीं होगा, जहाँ क्लेश नहीं, भय नहीं, सौहार्द हो , सम्मान हो, बराबरी की बात हो ,घर की खुशहाली हो, वही जन्नत है, स्वर्ग है।
Deepti DS
इसमें कोई दोराहे वाली बात नहीं है ये समाज दोगला है।उसे कभी भी औरत किसी भी रूप में पूर्ण नहीं दिखती इसलिए घर की स्वर्ग और नरक बनाने जैसी कहावत भी उसी के सर मढ़ दी है,जैसे बच्चों के अच्छे निकलने पर उसे कोई नहीं कहेगा कि माँ के संस्कार हैं पर बिगड़ने पर पूरा ख़ानदान चढ़ जाता है माँ ने बच्चे को बिगाड़ दिया,ऐसी दक़ियानूसी सोच और समाज को बढ़ावा मिलता है जब हम जवाब नहीं देना जानते,जिस दिन हम एकजुट होकर ऐसी सोच का विरोध करना शुरू करेंगे तभी इस कहावत के साथ और कूछ कहना भी बंद हो जाएगा।
Sangita Tripathi
सही बात है... एक औरत में इतनी शक्ति होती है,की घर को स्वर्ग और नरक बना सकती है..., आखिर दुर्गा और काली भी तो नारी का ही अवतार है.।
एक औरत में धैर्य, सहनशीलता और त्याग, प्रेम के स्वाभाविक गुण होते है.. इसलिए वो विशिष्ट होती है..।पुरुष में ये स्वाभाविक गुण नहीं होते.. वे औरत पर ही निर्भर करते है चाहे वो माँ, पत्नी, बहन या बेटी हो...मकान को घर बनाने वाली एक औरत ही होती है..., क्योंकि वो देने की प्रवृत्ति रखती है लेने की नहीं..।आखिर सृष्टि की जननी भी तो औरत ही है। 
Pratima Poddar
हमारा देश पुरूष प्रधान रहा है।अभी भी जहां औरतें शिक्षित नहीं हैं वहां औरत खुद ही इस बात को चरितार्थ करती हैं कि घर का स्वर्ग या नरक होना औरत की जिम्मेदारी है ।पढे लिखे समाज में स्त्री व पुरूष के सोच बदल रहे हैं और दोनों मिलकर घर को स्वर्ग बनाने में बराबर के जिम्मेदारी ले रहे हैं ।पर यह सच है कि औरतों के सहनशीलता , त्याग ,प्रेम धैर्य ,ममता , दूरदर्शिता व सूजबूझ की बराबरी पुरूष नहीं कर सकते क्योंकि स्त्री की संरचना ही ईश्वर ने कुछ इस तरह की है । मकान... हां मकान...... घर बनता है उसमें रहने वाले सदस्यों से तो घर के हर सदस्य की जिम्मेदारी है उसे स्वर्ग बनायें या नरक।सिर्फ स्त्री ही क्यों ? आवश्यकता है सोच बदलने की और कुछ हद तक बदल भी रही है ।
Priya Kumaar
मुझे लगता है इस तरह की कहावतों को नारी के मनोबल को बढ़ाने के लिए गढ़ा गया होगा मगर फिर इनका इस्तेमाल औरत पर जिम्मेदारी को थोपने के लिए दवाब के लिए होने लगा..नारी उत्थान के लिए कही गयी बातों का कभी कभी गलत तरह से इस्तेमाल होता है.. अतीत में नारी घर की लक्ष्मण रेखा में रहती थी और परिवार पर उसका गहरा प्रभाव रहता था तब ये कहावत बनी होंगी..
हर काल में नारी की स्तिथि एक समान नहीं रही है.. वो तो बातों को घुमा फिरा कर भ्रमित कर दिया जाता है समाज में..
वर्तमान समय ऐसा है हर क्षेत्र में नारी बराबरी से बढ़ कर अपनी काबलियत को साबित कर रही है तब घर को स्वर्ग नर्क बनाने या घर को संभाले का ये जुमला अच्छा नहीं.. घर के मान की जिम्मेदारी सिर्फ औरत की नहीं हो सकती,, घर के हर सदस्य की उतनी है जितनी औरत की.. सोच का बदलाव कही कही होना शुरू हुआ है समाज में.. मगर हम औरतों को भी औरत के प्रति अपनी सोच बदलनी होंगी.. क्युकी पक्षपात के लिए मर्द ही जिम्मेदार नहीं होते औरते भी होती है.. सास बहु बेटी बहन नंद ऐसे रिश्ते उदाहरण है की औरते खुद ही खुद के साथ भेदभाव कर बैठती है... सोचने का विषय भर नहीं अमल करने की बात है..तो मुझे लगता है खुद का सम्मान करे औरो को भी मान दे तभी औरत की स्तिथि सुधर सकती है। 
Tulika Das
नहीं मुझे नहीं लगता कि सिर्फ एक स्त्री किसी भी घर की सुख दुखकी अकेले जिम्मेदार होती है पर दो बातें जरूर कहूंगी कि अगर व्यक्ति की सोच बुरी हो तो आसपास नकारात्मकता जरूर फैलती है और ज्यादा जरूरी बात जो मुझे समझ में नहीं आती कि घर में स्त्री ही अलग-अलग रूप मेें अपनी भूमिका निभाती है ,एक स्त्री मां होती है , बहू होती है प,त्नी होती है, बेटी होती है, पर स्त्री मां बन कर बेटी को प्रेम देती है वहीं एक स्त्री सास बन कर बहू को स्वीकार नहीं कर पाती , कड़वा है पर सच है। सुख शांति परिवार में तभी हो सकती है जब एक स्त्री दूसरी स्त्री के वजूद को स्वीकार कर ले उसे अपना ले। 
अगले सप्ताह एक और विषय पर चर्चा के विचारों हम आप सभी के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। 
पिंक कॉमरेड् डेस्क 
 

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