बिदाई की बेला

बिदाई की बेला

शादी में बस कुछ महीने का वक़्त बाकी था , मन में खुशियों और उमंगों का सागर था और साथ ही घर छूटने का दुःख। बाजार से बारीख़ी से जांच परखकर खरीदी गयी एक एक चीज़ ,घर से दूर होने के गम को धुंधला कर देती। तो कभी रात को माँ पापा के सोने के बाद मैं घंटों जागकर आंसू बहाती। फिर थोड़ी देर माँ से लिपटकर सो जाती। अगले दिन सुबह फिर से वही नयी चीज़ों को खरीदने की उमंग मेरे आँखों के आंसुओं को कहीं छिपा देती। एक एक करके दिन बीतते गए और अब बस दो दिन का समय बीच में था , रिश्तेदारों का आना शुरू हुआ और चारों तरफ बस रौनक ही रौनक। बहने सजने संवरने और गाने नाचने में व्यस्त थी , पापा और भाई शादी की तैयारियों में। और माँ का तो क्या कहूँ वो कभी मेहँदी की रस्म की तैयारी करती तो कभी हल्दी और संगीत। खुद का खाना पीना भूल, माँ पूरी जी जान लगाकर मेरे बेहतर कल की शुरुआत में जी जान लगा रही थी।

मैं कमरे की चौखट पर बैठ सबको एक टुक देखती रहती और अपना बचपन याद करती ” कैसे स्कूल से लौटते ही मैं बातों की झड़ी लगा दिया करती थी।  बिल्कुल वैसे ही आज माँ से ना जाने क्यों फिर घंटों बातें करने का मन कर रहा था। मन कर रहा था बस उनका हाथ पकड़ कर कही शांति वाली जगह ले जाऊं। पर वक़्त की कमी थी अब , ढेरों रस्मे बाकी थीं। घंटों क्या अब माँ के पास शायद एक पल की फुर्सत नहीं थी। नज़रें घूमते घूमते बहनो की तरफ चली गयी।   बार बार एक ख्याल मन में आ रहा था की कितना समय लड़ते झगड़ते बिता दिया। और अब जब हम बिछड़ने वाले हैं ,उनकी आँखों में वो बेचैनी साफ़ दिखाई पड़ रही है। भाई और पापा का चेहरा तो बस एक सपने के जैसे दिखाई देता और फिर देर रात , भागदौड़ से मुरझाया हुआ चेहरा देख लगता की हर दिन की तरह पापा के लिए एक कड़क चाय बना दूँ। और भाई को गले लगाकर कहूं , भैया थोड़ी देर आराम कर ले।  पर जैसे ये सब कुछ अब नामुमकिन था।  हल्दी का पीला रंग कुछ यूँ चढ़ा , बचपन का हर रंग फीका पड़ रहा था।

घड़ी की सुई ने मानो किसी दौड़ में शामिल हुई हो।  समय पंख लगाकर उड़नछू हो गया। बस एक ही दिन बचा था और सभी तैयारियां हो चुकी थी।  ढोलक की आवाज़ के साथ सधते गाने के बोल  “कभी बन्नो तेरी अँखियाँ सुर में दानी तो कभी लाडो छोड़ लडकपन पीहर का , इन बोलों ने मेरे दिल को पसीज दिया था। जहाँ देखो हंसी ठिठोली ,नाचना और गाना के बीच , मुझे लग रहा था जैसे कुछ हाथ से फिसलता जा रहा है । स्कूल का पहला दिन और आज का दिन बिल्कुल एक जैसा लग रहा था। आज भी मन कर रहा था ,कोई बहाना बना दूँ की सब मुझे रोक ले। आज मन में कोई उत्साह नहीं था बस चेहरे पर एक एक फीकी सी मुस्कान और मन में बेचैनी थी।

घर की एक एक चीज़ को देख कर छू कर ऐसे लगा की न जाने क्या क्या छूट रहा है। रसोई में पानी का गिलास लेने गयी तो माँ के हाथ से लगायी गयी एक एक चीज़ ,  वो गरम गरम स्वादिष्ट खाना बनाने वाला चूल्हा भी जैसे कहता हो रुक जाओ लाड़ली ? ये सब और सहन नहीं हुआ और उठकर अपने कमरे में चली गयी ? अगले ही पल कमरे का दरवाजा किसी ने खटखटाया , देखा तो पापा हाथ में खाने की थाली लिए खड़े थे और उनके पीछे घर के सब लोग और एक स्वर गाने लगे ” बाबुल का ये घर गोरी ,कुछ दिन का ठिकाना है”। हम सब ने उस रात घंटों ढेर सारी बातें की और वही बैठे बैठे कब सबकी आँख लगी पता भी नहीं चला।

मायके की खुशबू आज भी बेवक़्त यादों में चली आती है और उसमें घंटों खोये रहना कितना खूबसूरत होता है ये सिर्फ बेटियां जान सकती हैं।

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