प्रसिद्ध यात्री भाग 2

प्रसिद्ध यात्री  भाग 2

 हर विषय का एक इतिहास होता है। यात्रा का इतिहास भी अनेक रोचक यात्राओं के संस्मर्णों और यात्रियों की कहानियों से भरा हुआ है। आइए आज जानते है इतिहास के प्रसिद्ध यात्रियों के  बारे में-

मेगस्थनीज यूनान का एक राजदूत था जो चन्द्रगुप्त के दरबार में आया था। यूनानी राजा सिल्यूकस ने भारत पर दोबारा राज करने की इच्छा से भारत पर आक्रमण किया था किंतु उसे संधि करने पर विवश होना पड़ा था। संधि के अनुसार मेगस्थनीज नाम का राजदूत चंद्रगुप्त के दरबार में आया था। वह कई वर्षों तक चंद्रगुप्त के दरबार में रहा। उसने जो कुछ भारत में देखा और जाना, उसका वर्णन उसने अपनी पुस्तक "इंडिका"में किया है। राजा चंद्रगुप्त के राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र का वर्णन भी उसकी पुस्तक में है एवं चंद्रगुपत के शासनकाल का भी उल्लेख है। उसने लिखा है कि चंद्रगुप्त के शासन में शांति और अच्छी व्यवस्था रहती थीं, अपराध कम होते थे तथा लोगों के घरों में ताले नहीं बंद होते थे। मेगस्थनीज की पुस्तक "इंडिका" आज इतिहास का एक बहुत ही महत्वपूर्ण भाग है जो हमें मौर्य साम्राज्य की शासन व्यवस्था का ज्ञान देती है।

र्माको पोलो एक एतालवी व्यापारी, खोजकर्ता एवं राजदूत था। वेनिस में जन्मा र्माको यात्रा करने वाले सर्वप्रथम यूरोपियनों में से एक था। सफर के लिए मार्को पोलो ने जो रास्ता अपनाया था, उसे आज सिल्क रूट के नाम से जाना जाता है।  लगभग १७ वर्ष तक बगदाद और चीन का भ्रमन करके जब मार्को पोलो का सफर खत्म हुआ तो उसके बाद उसे कई सालों तक कुबलाई खान का राजदूत बनकर जिंदगी गुजारनी पड़ी। यात्री और व्यापारी के बाद एक राजदूत के रूप में काम करते हुए भी मार्को पोलो ने कई नए अनुभव किए। इसका वृतांत 'द बुक ऑफ सर-मार्कोपोलो' के नाम से हैं, जो तत्कालीन चीन के अर्थिक इतिहास को दर्शाता है। इस किताब के जरिए मार्को पोलो ने पश्चिम को कुबलाई खान के पूर्व की हकीकत से रूबरू करवाया। इसके लिए र्माको पोलो को 'मध्यकालीन यात्रियों का राजकुमार' की उपाधि दी गई।

इब्न बत्तूता एक अरब यात्री, विद्धान् तथा लेखक था। इनका जन्म मोरोक्को प्रदेश के तांजियार में हुआ था। इन्होंने लगभग ७५,००० मील की यात्रा की थी। उन्हें अपने धर्म और उससे जुड़े देशों के बारे में जानने की तीव्र इच्छा थी। इब्न बतूता की सर्वप्रथम यात्रा हज करने के लिए मक्का की थी। माना जाता है कि बतूता तीन वर्षों तक मक्का और मदीना के बीच रहे। इस दौरान उन्होंने दो बार हज किया तथा नयी जगहों का भ्रमण किया। मक्का में उन्होंने कई लोगों से पूरब के देशों, खास कर भारत के बारे में बहुत कुछ अच्छा सुना। इन देशों के बारे में जानने की उत्सुकता ने उसे आगे की यात्रा करने पर विवश कर दिया। वह छोटी-बड़ी कठिनाइयों को पार करते हुए अफ़गानिस्तान से होते हुए हिन्दू कुश के रास्ते दिल्ली पहुंचे। उस समय वहाँ मुस्लिम शासक मोहम्मद बिन तुगलक़ का शासन था। उन्होंने तुगलक़ के दरबार में कई वर्षों तक काज़ी के रुप में भी कार्य किया। इसके पश्चात वह वापस तांजियार लौट आए। वहाँ सुल्तान अबू इनन की आग्रह पर इब्न बतूता ने अपनी यात्रा के वृत्तांत को "रिहला" नामक पुस्तक में कलमबद्ध किया जो आज विश्व के इतिहास का एक अनूठा हिस्सा है।

~सुमेधा
विभिन्न स्त्रोतों से साभार।

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