Saroj Pawan

Saroj Pawan

 2 years ago

Member since Mar 19, 2020

प्रतिकार

आज भी कमबख्त पता नहीं कहां निकल गया। दुपहरिया होने को आई यह भी ना देखत, ओके लाने ही सुब्बहो से भूखी प्यासी मरत हूं।

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एक पाती बेटी के नाम

इतना आसान कहां होता है हम औरतों के लिए मन की बातें कहना। मन में अनेकों विचार बाहर आने के लिए छटपटाते हैं लेकिन कह नहीं पाते। कभी मर्यादा,...

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दहकती अंगीठी

मैं अपनी डेढ वर्षीय बेटी के साथ अपने मायके आई हुई थी। जनवरी में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी । सुबह के समय, मैं अपने पापा के साथ बैठी...

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बचपन और रिक्शे का सफर

बचपन की सुनहरी शरारती यादें, जब तब आकर बरबस ही होठों पर मुस्कान बिखेर जाती हैं। ऐसा ही एक शरारती किस्सा मैं यहां साझा कर रही हूं।

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कृष्णा सोबती- भारतीय हिंदी साहित्य की सशक्त...

हिंदी साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर कृष्णा सोबती जी का जन्म गुजरात में 18 जनवरी 1925 को हुआ था। विभाजन के बाद गुजरात का यह क्षेत्र पाकिस्तान...

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चीफ की दावत....एक करारा व्यंग्य आधुनिक खोखले...

चीफ की दावत' में हमारे मध्यमवर्गीय समाज में पांव पसारते खोखलेपन, दिखावटीपन व रिश्तो  को अपने स्वार्थ पूर्ति हेतु  उपयोग को दिखाया...

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हिंदी भाषा मेरी पहचान

फ्लावर नहीं मम्मी फ्लार कहते हैं।" मिष्टी अपनी मम्मी को टोकते हुए बोली। "हमें तो ऐसा ही परनाऊंश करना सिखाया था, हमारी  टीचर्स ने।"...

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मेरी प्राइमरी अध्यापिका

आज भी सरिता को याद है । दादी और दूसरे लोग, काले रंग  और साधारण नैन नक्श के कारण उसे पास नहीं फटकने देते थे। कोई बच्चा उसके साथ नहीं...

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मेरे दोस्त

पहिया उम्र का यह कभी आगे बढ़ने नहीं देते                बचपन कभी ये मिटने नहीं देते वक्त को लेते हैं जो थाम            ऐसे ही जिद्दी...

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छिछोरे-कोशिश करना महत्त्वपूर्ण है

इस फिल्म की जान है, इसकी स्टोरीलाइन। जी हां, इस फिल्म को देखते हुए, जहां आप अपने कॉलेज के दिनों को एक बार फिर भी जी उठोगे

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