रसोई केवल माँ की ही क्यों?

 रसोई केवल माँ की ही क्यों?

पुराने समय में स्त्रियों के लिये सबसे सुरक्षित स्थान घर ही माना जाता था इसलिये स्त्रियों के लिये घर के कार्यो में निपुण होना सर्वोपरी था।ससुराल वालों को लड़की की शैक्षिक योग्यता से कुछ लेना देना नहीं था बल्कि वे लोग ये देखते थे कि लड़की कितने बड़े (संख्या)वाले परिवार से आ रही है क्योंकि उसके मायके में जितने ज्यादा लोग होंगे वो उतने अच्छे से ससुराल में मैनेज कर सकती थी।उस पर यदि लड़की  यदि पाक कला में निपुण है तो सोने में सुहागा ,उसे तो  फिर सुघड़ बहु की संज्ञा से नवाज़ा जाता था।

समाज की सोच भी ये ही थी कि यदि स्त्री घर से बाहर काम में निकल जायेगी तो शायद कहीं  पुरुष की तरह सर उठा कर तो नहीं जी लेगी। पर समय बदला ,सोच बदली और सबसे बड़ी बात स्त्री के कदम दहलीज से बाहर निकलने लगे।कुछ घरो में उसने विद्रोह से ये सब किया तो कुछ घरो में उसे पुरुषों ने सहयोग किया।बहरहाल समाज में एक सकारात्मक परिवर्तन हुआ।

अब यदि स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर घर से बाहर धनोपार्जन कर रहे हैं तो घर के भीतर भी काम बंट गये।परन्तु यहाँ पर भी एक बात मेंशन करना चाहुंगी कि अभी भी हर घर मे रसोई का काम पुरुष नहीं करते चाहे उस घर में वे दोनों कमाऊ हों।स्त्री पुरूष का रसोईघर में साथ काम करना उन्ही घरो में देखा जाता है जहाँ पुरुष में सहयोग की भावना होती है।

आज का सुलझा पुरुष स्त्री के थके होने पर उसके काम से लौटने पर  एक कप चाय बनाने में गुरेज़ नहीं करता।वो उसके बीमार होने में रसोई घर मे बेहिचक जा उसके लिये दलिया,खिचड़ी बना सकता है ,रात को अपने छोटे बच्चे के लिये दूध गर्म कर सकता है।दोस्तो बहुत हद तक अब माओं की सोच में भी परिवर्तन हुआ है किशोरावस्था से ही वे बेटों को चाय रोटी ,खिचड़ी,ऑमलेट, दलिया जैसी चीजें बनाना सिखाने लगीं है ताकि बच्चा घर से बाहर जाने पर खुद के लिये ये सब बना सकें।तो दोस्तो घर की रसोई केवल माँ की ही क्यों???

ये शिक्षा यदि आप अपने पाल्यों को बचपन से ही देना शुरू कर दें तो इस प्रश्न का औचित्य ही नहीं रहेगा।कैसा लगे मेरे विचार,जरूर बताइयेगा।
धन्यवाद
आपकी स्नेह।

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