रास्ता दिल का दिल से दिल तक

रास्ता दिल का दिल से दिल तक

"बिटिया, ध्यान रहे ,सबके दिल का हाल जानों, सबके मन की खुशियों को समझो, ससुराल में यही काम आयेगा।" 

माँ, जानती हूँ, समझती भी हूँ, पर इस बात का हमेशा पालन कर पाऊँगी ये कह नहीं सकती।

हाँ, मैं तुम्हारी माँ हूँ, तुम्हे जानती हूँ, पर फिर भी कह रही हूं।

माँ... तुम भी ना। इतना मत सोचो औऱ खाना खाओ।

क्या बातें हो रही हैं माँ बेटी के बीच? हम भी तो सुनें।

जी, मम्मी, कुछ खास नहीं, बस यूं ही।

सेजल की माँ, उसके ससुराल में कुछ दिनों के लिए रहने आई थीं।
सेजल अपनी माँ को आगे कुछ कहती इससे पहले उसकी सास वहाँ आ गईं।

दोपहर के खाने के बाद, तीनों बैठक में बिछे गद्दे पर आराम करने गई।

अजी, आराम क्या, गपशप कहिये।

बातों का सिलसिला शुरू ही हुआ था, कि घर के नौकर ने एक पुड़िया लाकर सेजल को पकड़ाया।

वह देख सेजल की मुस्कुराहट ऐसी हो चली जैसे कि किसी ने कीमती तोहफ़ा दे दिया हो।

पान!

सेजल की माँ उसे बड़ी बड़ी आँखों से घूरने लग गई। मन ही मन सोचने लगी, इसकी ये आदत अभी तक नहीं गई। हे भगवान! क्या सोचेंगे ससुराल के लोग। बहु ऐसी है वैसी हैमुझे सेजल से बात करनी होगी।

समधन जी! क्या हुआ। आप इतनी हैरान परेशान क्यूँ लग रही हैं?

जी..वो..ये?..मतलब कैसे कहूँ? आप ..कुछ.. कहती नहीं इससे?

किसे?और क्या कहना है?, सेजल की सास ने पूछा।

सेजल पान खा रही है,आपके यहाँ तो कोई पान खाता ही नहीं है, फिर आपने कैसे इसे कुछ समझाया नहीं।

हा हा हा! पान ही तो है समधन जी,आप इतना क्यूँ सोच रही हैं? सेजल को ये पसंद है, और वो अपनी पसंद की चीज खा रही है। बस।

पर? सेजल की माँ अब भी असंतोष व्यक्त करते हुए कुछ कहने जा रही थी कि सेजल की सास ने उन्हें टोकते हुए कहा..

आप बेवजह परेशान हो रही हैं। मैंने सुना आप सेजल से कह रहीं थीं कि सबका ध्यान रखो, वगैरह वगैरह। पर मैं आपसे कुछ कहूँ? बुरा मत मानियेगा।

कोई किसी का ध्यान रखने या उसे संभालने या फिर उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए रिश्ते नहीं जोड़ता। सबको खुशियाँ चाहिए, अच्छे अनुभव चाहिए इसलिए वो रिश्ते बनाते हैं जो आगे चल कर अटूट हो जाते हैं। फिर वो चाहे कोई भी रिश्ता हो। औऱ जहाँ बात हम औरतों की हो रही हो तो हमसे ज्यादा इसकी एहमियत और कौन समझेगा?

आपको पता है, जबसे सेजल इस घर में आई है, हर बड़े-छोटे पल में, घर औऱ बाहर से जुड़ी हर दरकार में, चाय पर चर्चा हो या ननद-भाभी की देर रात वाली खुफिया बातों में, सेजल वही है जिसे हमने आपके घर पर पहली बार देखा था,जिसके बारे में आपने हमें बतलाया था- ऐसी है हमारी सेजल।

और इससे पहले की आप वापस मुझे धन्यवाद देना शुरू करें, मैं कहना चाहूँगी की हमने कुछ अलग नहीं किया, जैसे थे वैसे ही हैं और सेजल जैसी थी, वैसी ही है..

सेजल - (मुँह मे पान दबाये) माँ.. मम्मी ने समझा दिया इतना विस्तार से अब तो समझ जाओ।

तीनों की हँसी उस कमरे में गूँजने लगी।

कुछ दिनों बाद...सेजल की माँ का जाने का समय आ गया था।दोनों माँ- बेटी एक दूसरे के हाथों को जकड़े करीब बैठे हुए थे।

सेजल- माँ, एक बात कहूँ। एक औरत होने के नाते मैं सोचती थी कि आदमी के दिल का रास्ता उसके पेट से होकर गुजरता है, पर औरत के दिल के रास्ते को खोजकर वहाँ कैसे पहुँचा जाए,उसके बारे में कोई सोचता है क्या?

बाक़ियों का तो पता नहीं, पर हाँ यहाँ, इस घर ने और इस घर के लोगों ने मेरे दिल तक पहुंचने का रास्ता खोज लिया।
अपने दिल से थोड़ा सा प्यार और ढ़ेर सारा दुलार मेरे दिल तक भेज दिया।

माँ अपने आँसुओं को रोकते हुए, सेजल को गले लगाते हुए बोली- कौन कहता है कि सिर्फ तोहफों और कुछ अलग तरीकों से ही एक औरत के दिल तक पहुंचा जा सकता है, बस उसे औरत के रूप में रहने दो, उसके दिल तक के फासले,अपने आप तय हो जाएंगे।

धन्यवाद।
सुषमा

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