रिश्ते प्यार,विश्वास व सहयोग से बनते हैं।

रिश्ते प्यार,विश्वास व सहयोग से बनते हैं।

"तुम बिन मैं कुछ भी नहीं,,कुछ भी नहीं।लौट चलो अपने घर,श्यामा।लौट चलो।"-देव वहीं पर हाथ जोड़कर जमीन पर रोते-रोते बैठ गया।"कौन सा घर देव?अगर वह मेरा भी होता तो तुम यूँ मुझे धक्के मारकर घर से नहीं निकालते।तुमने निकाला तभी तो मैं यहां आई हूँ।"-श्यामा ने कड़क आवाज में कहा।

तब तक श्यामा के मम्मी पापा बाहर आ जाते हैं।वह उससे यहां आने का कारण पूछते हैं।"मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई है,बहुत बड़ी।मैंने ऐसा कैसे किया आपकी बेटी के साथ।मैं कान पकड़कर माफी मांगता हूं।आप लोग बड़े हैं जो सजा देना चाहते हैं दीजिये।गलती जो की है।"--देव ने अब कान पकड़ते हुए सभी से कहा।

श्यामा बोली-"माफी गलती की दी जाती है धोखे को नहीं।तुमने धोखा दिया है विश्वास को तोड़ा है।अरे तुमने सोचा तुम्हारे दोनों हाथों लड्डू रहेंगे।क्या समझ रखा है।शादी कर ली तो मुझे अपनी जागीर समझने लगे।"श्यामा ने गुस्से से कहा।

"तुमको पहचान ही नहीं पाया।तुमने हमेशा मेरे लिए सोचा और मुझे माफ कर दो।मेरे आँखों में पट्टी बंधी थी।मैंने सच धोखा दिया।तुम जो सजा देना है दो।मैं तुम्हारा गुनहगार है।वह लड़की सही नहीं थी।मैं उसके प्यार में पागल था।वह सच में मुझे पागल बना कर चली गई।"-देव ने कहा।

"तुमने ये बात सभी से क्यों छुपाई की तुम्हारा उस लड़की से शादी से पहले पहले से अफेयर था।फिर तुमने शरीर शादी क्यों की क्यों मेरा जीवन खराब किया।अगर इसका उल्टा मैं करती तो मुझे चरित्रहीन कह देते।क्या तुम दोनों चरित्रहीन नहीं हो?"-श्यामा गुस्से से बोली।

"अब तुम उस घर में दोबारा नहीं जाओगी।जो बंदा तुम्हारे समझाने पर भी तुम्हें धोखा दे सकता है।वह फिर धोखा देगा तुम्हें।"-श्यामा की माँ ने दृढ़ता से कहा।

"तुम सही कह रही हो माँ।इसे मेरी तब याद आई जब वह इसे धोखा देकर चली गई।न वो जाती न ये आता।देखा ये प्रकृति का नियम है,तुमने मुझे धोखा दिया और उसने तुम्हें धोखा दिया।जैसे को तैसा।"-श्यामा ने कहा।

"मैं खाली हाथ नहीं जाना चाहता।वो लोग भी बुढ़े हो गए हैं।उनको भी किसी की जरुरत है।हमारे बच्चे को अकेले तुम कैसे पालोगी।"-देव ने आखिर बाजी चली।

क्यों खाली हाथ नहीं जा सकते।मैं भी तो ससुराल से आधी रात को खाली हाथ आई थी।कौन बुढ़ा हो गया?।जब मैंने तुम्हारे इश्क की सच्चाई तुम्हारे मम्मी पापा को बताई तो उन्होंने इसका इलजाम मेरे सिर डाल दिया कि मेरे प्यार और केयर न करने के कारण ऐसा हुआ है।रही मेरे बेटे की बात नौ महीने पेट में रखा है तो जीवन भर पाल भी लूँगी पर तुम्हारी परछाईं नहीं पड़ने दूँगी।तुम्हारे जैसा हर्गिज़ नहीं बनने दूँगी।"-श्यामा ने बेटे को अपने पीछे करते हुए अहा।

देव बोला-"तुम कैसे जीवन काटो....।"

"बस बहुत हुआ।क्या कहना सुनना बाकी रह गया?मेरी बेटी है।जैसे शादी से पहले रहती थी वैसै ही अब रहेगी।कमजोर थोड़े ही मेरी बेटी।इसलिए तो पढ़ाया है उसे मुसीबत आने पर अपने पैरों पर खड़ी हो सके।तुम्हारी पत्नी बनने से पहले वह मेरी बेटी है।हमारा अधिकार ज्यादा है उस पर।अगर थोड़ी भी शर्म बाकी हो तो दफा हो जाओ।नहीं तो मजबूरन पुलिस बुलानी पड़ेगी और हाँ जल्दी ही तलाक का नोटिस घर पहुंच जायेगा।"-यह कहकर श्यामा के पापा ने किवाड़ लगा लिए।

दोस्तों, यह सिर्फ कहानी नहीं है।पुरुषों के विवाहेत्तर संबंध मिलने पर उसे दबाने की कोशिश की जाती है कि पुरुष हैं मन भटक जाता है और यह सिलसिला चलता रहता है।एक औरत जबरदस्ती उस गृहस्थी की गाड़ी को खींचती रहती है।जिसमें न प्यार होता है,न सहयोग।बस वह स्त्री, समाज क्या कहेगा?यह सोचकर रिश्ता निभा रही होती है।वैसे भी जहां, प्यार,विश्वास, सहयोग नहीं तो वह रिश्ता कैसा?कड़वा है पर सत्य है।स्वरचित व मौलिक।
धन्यवाद
राधा गुप्त 'वृन्दावनी'

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