रिश्ते – साइलेंस मोड / ऑनलाइन शोर

रिश्ते – साइलेंस मोड / ऑनलाइन शोर

पिंक कामरेड्स, आप ये आर्टिकल जरूर पढ़े। हालांकि हम सभी इस सच्चाई से अवगत हैं लेकिन कँही ना कँही हम सब इसका हिस्सा भी बने हुए हैं ! मुझे उम्मीद है की इसे पढ़कर हम अपनी पीढ़ियों के अच्छे भविष्य के लिए थोड़ा सा बदलाव अपने व्यवहार मे ज्ररूर लाएंगे

हम हर समय बिगड़ते हुए परिवेश की बात करते हैं, हर समय शिकायत करते है की अब माहौल पहले जैसा नहीं रहा, अब रिश्ते नाते वैसे नहीं रहे , लोग एक दूसरे से प्यार नही करते   या फिर की अब परिवार के सदस्यों मे भी पहले जैसी आत्ममीयता नही रही ! पर क्या कभी हम विश्लेषण करते हैं की क्या कारण है ऐसा होने का । शिकायत तो हम सब कर रहे हैं पर क्या कोई इसकी जड़ को समझने की कोशिश करता है ?

पहले ज्यादातर लोग सयुंक्त परिवार मे मिलजुल कर रहते थे। परिवार के मुखिया की बात के साथ सुनी जाती थी, घर के सब सदस्य दुःख सुख मे साथ साथ होते थे I परिवार के बच्चे हर छोटी बड़ी बात मे एक दूसरे से सलाह लेते थे ! अक्सर तो देखने वालों को पता ही नही होता था की कौन सा बच्चा परिवार मे से किस भाई का होगा और यंहा तक की बच्चों को खुद भी कजिन शब्द का मतलब नही पता होता था बस “भाई” या “बहन” दो ही शब्द थे । कोई ताई-चाची-बुआ-मौसी किसी भी बच्चे को डाँट दे पर कोई बुरा नही मनाता था !

अब समय बदल गया है, सयुंक्त परिवार की जगह एकल परिवारों ने ले ली है ! बच्चे जन्म से ही “मै और मेरा” सीख जाते हैं, सिबलिंग, कजिन, पैटर्नल और मैटर्नल रिलेटिव्स इत्यादि शब्द बहुत आम हो गए हैं । बाकि सब तो क्या माता पिता भी बच्चों को ऊँची आवाज मे डाँटने की हिम्मत नही करते कि पता नही क्या प्रतिक्रिया आ जाए ! पहले जंहा बच्चों कि सब छुट्टियां इकट्ठे खेलने कूदने मे बीत जाती थी वंही अब कोई वर्कशॉप, ट्रेनिंग, समर कैम्प्स इत्यादि के नाम पर बच्चे आपस मे ये हसीं पल भी बीता नही पाते। कहा तो बच्चों कि गर्मियों कि सारी छुटियाँ नानी के घर मे बीतती थी कहा अब पढ़ाई के नाम पर सालों साल मिलना नही हो पाता।

एक और कमी जो मुझे लगता है आई है उन संस्कारों मे जो हम अपनी अगली पीढ़ियों को दे रहे हैं । “सयुंक्त से एकल”, “हम से मै”, “”हमारी से मेरी” वाली सोच के साथ एक और बदलाव आया है, अब हम बाल मन पर अपनी सोच का प्रभाव बनाने की कोशिश करते हैं,  अपने बच्चों को खुद बताते हैं कि कौन परिवार मे अच्छा है और कौन बुरा, जिससे की रिश्तों के प्रति एक सकारात्मक सोच बन ही नही पाती !

इंटरनेट के इस युग मे बच्चे अपने परिवार को छोड़कर सबको अपने सोशल-प्रोफाइल से जोड़ कर रखते हैं, अपने लोगों को या तो ब्लॉक कर दिया जाता है, या अपनी पहचान बदल कर अकाउंट बनाये जाते हैं ! फ़ोन तो एक ऐसी चीज हो गया है जिस के बिना हम सब लोग साँस भी नही ले पाते, यही फ़ोन तो हम सबको दुनिया से जोड़े रखता है और यही फ़ोन तो हमे आज़ादी देता है ये निर्धारित करने की कौन से चाचा, मामा, बुआ, फूफा, मौसी इत्यादि को अपनी लाइफ से दूर रखना है या कहिये किसको अपना नंबर नही देना है और अगर नंबर चला गया तो अकाउंट सेटिंग क्या करनी है इत्यादि । और भी दुःख की बात तो यह है कि बच्चे ये सब हम माता पिता की जानकारी मे रहकर कर रहे हैं ! घर से बाहर एक ऐसी दुनिया हमने बना ली है जिसमे सिर्फ तारीफ़ मिलती है -सब एक दूसरे को खुश करने मे लगे हुए हैं और जो घर है या अपने लोग है वो बहुत पराये हो गए हैं !

आइये दोस्तों, थोड़ा सोच विचार करते हैं और अपनी पीढ़ी को इस आर्टिफीसियल दुनिया से बचा कर घर परिवार से जोड़ कर रखते हैं , उन्हें परिवार देते हैं, संस्कार देते हैं और देते हैं अपनों से जुड़े रहने की समझ।कंही ऐसा ना हो की हम अपने रिश्तों को ब्लॉक करने मे लगे रहें और हमारे रिश्ते हमे ब्लॉक करने मे और सब रिश्ते कंही चले ना जाएँ साइलेंस मोड पर और और अंत मे रह जाए बस ऑनलाइन शोर।

Image credit @HuffPost

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