सैंडल वाली बहू

सैंडल वाली बहू

हर इंसान के जीवन में, कई ऐसी घटनाएं होती हैं,। जब वो शर्म से लाल हो जाता हैं..।और ताउम्र याद रखता हैं।जब भी मै अपनी यादों की पोटली खोलती हूँ, एक घटना आज भी मुझे, शर्म से लाल कर देतीं हैं.।


घटना मेरी शादी के समय की हैं।,शादी दिसंबर की ठंड में हुई थी.।आठ घण्टे का सफर कर जब मै ससुराल पहुंची,। तो रात के आठ बज गए थे..। ससुराल गाँव में थी.। एक किलोमीटर बाद जंगल शुरू हो जाता था..।वहां अंधेरा थोड़ा जल्दी हो जाता था..।


गाँव के घर वैसे भी बहुत बड़े होते हैं.. सामने खूब बड़ा सा लॉन..। जैसे ही हमें गांव में प्रवेश किया.. घुप अँधेरे ने हमारा स्वागत किया...। तब गांव में लाइट, कम समय के लिये आतीं थी..। कार के रुकते ही ढेरों फुसफुसाहट सुनाई देने लगी -अभी तुम लोग बैठे रहो, परछन होगा..। बारी -बारी से परछन होने लगा..। अँधेरे में कुछ दिखाई नहीं दिया,। मेरी सास और बड़े लोगों ने परछन कर, मुझे सिंदूर लगा,, दही पेड़ा खिला कर स्वागत किया...। मेरे होंठ तो किसी को दिखा नहीं, जिसको जहाँ जगह मिली,मतलब मेरे गाल, नाक, माथे पर,जहाँ जिसको जगह मिल गई,...पेड़ा -दही खिला कर कर्तव्य की इतश्री कर ली..। मुझे लगा, जुबान पर तो दही -पेड़ा का स्वाद आया ही नहीं,और सब ने खिला भी दिया..।


खैर, राम -राम करते उस घुप अँधेरे में, कार से उतारा गया, तो पैर जमीन पर नहीं, किसी सामान पर पड़ा..। तुरंत पैर पीछे किया, तभी सुनाई दिया, डलिये के अंदर ही पैर रख कर चलना होगा बहू...। किसी तरह डगमगाते हुए, पैर रखा, लगा गिर जाऊँगी, तभी पति ने पूछा, तुम हील वाले सैंडल पहनी हो क्या...। कैसे बताती पेंसिल हील पहनी थी , जिसका उनदिनों फैशन था.।.. थोड़ा झिझकते हुए हाँ में गर्दन हिला दी... पर अँधेरे में उनको दिखा नहीं... धीरे से हाँ बोली,.मेरे हाँ कहते ही, उन्होंने बोला उसे उतार कर हाथ में ले लो.। एक हाथ में सैंडल ले लिया, तब भी साड़ी में पैर उलझ रहा था.। देखा, इतना पिन अप करके पहनाई साड़ी की प्लेट बाहर निकल गई..। जिससे मेरा पैर उलझ रहा था..। दूसरे हाथ में दही के डब्बे के साथ साड़ी की प्लेट भी पकड़नी पड़ी.। मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया, कि अच्छा हैं जो लाइट नहीं हैं, यहाँ..।वरना लोग क्या कहते..।


जैसे ही मुझे कोहबर में लाया गया, उसी समय बिजली आ गई...। हँसी की जोर दार आवाज सुनाई दी.। मै घबरा गई..। तभी किसी ने मेरा घुंघट भी उलट दिया, अब तो सब पेट पकड़ कर हँस रहे, मै हैरानी से सबको देख रही थी... पति को देखा तो वो भी पेट पकड़ हँस रहे थे.। नन्द रानी ने हाथ पकड़ कर शीशे के सामने कर दिया..। सिंदूर, दही -पेड़ा से पुता हुआ चेहरा, साड़ी और सैंडल, हाथ में पकड़े मै,... किसी ने बोला, अरे बहू पहले से ही हाथ में सैंडल ले कर आई हैं..।विवेक संभल कर रहना..।.सिंदूर और दही -पेड़ा से पुता मेरा चेहरा,शर्म से और लाल हो गया..। मेरी पहचान सैंडल वाली बहू बन गई..।


अब भी पति कभी कभी छेड़ते हैं। बाप रे तुम तो पहले से ही सैंडल हाथ में लेकर , घर आई थी. शादी के समय मुझे साड़ी पहननी नहीं आतीं थी, ये बात विदा के समय बहन ने पति को बता दिया था.। और खूब पिन लगा कर साड़ी पहनाई थी की खुले ना..।आज भी सब लोग ये वाकया याद कर खूब हँसते हैं।


--संगीता त्रिपाठी 

 #जब मै शर्म से लाल हो गई







             




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