सफ़र में मिलने वाले लोग

सफ़र में मिलने वाले लोग

कुछ जाने पहचाने लग रहे हैं

वो सफ़र में मिलने वाले लोग

अनजानी सूरतों में छुपे से

दिल को भाने जाने वाले लोग।


सामने बैठे बस टक - टकी लगाते  हैं

लगता पहले भी मिले थें कभी

चेहरे पर ऐसे ही भावों को लिए 

सामने बैठ एक टक घूरने वाले लोग। 


सफ़र लंबा है ये भान रख कर

मिलनसार हो मंद-मंद मुस्काते हैं

बस एक मौके की ताक में बैठे

बात करने को उतावले लोग।


शब्दों को ढूँढ कर यूँही

कानों में मीठा रस घोलते हैं

उनकी बातों से अपने से लगते

वो अपना समझने वाले लोग। 


एक शहर या एक गाँव की 

पहचान को ढूँढते हुए 

वो गपशप में रम कर

सोच में डूबने-डूबाने वाले लोग।


अपने मन को हल्का करना 

बस यही चाहत लिए 

अजनबी को अपना बना

अपने दुखड़े रोने वाले लोग।


सफ़र पूरा होते ही 

अपना बोरिया-बिस्तर लपेटते 

एक दूसरे की मदद करते

सफ़र में मिले मतवाले लोग।


"अजी! आपके साथ तो 

सफ़र का पता ही ना चला।"

अच्छा जी, चलते हैं... कहते 

सिर्फ़ एक सफ़र के हमराही लोग। 


स्वरचित एवं मौलिक 

दीपाली सनोटीया



What's Your Reaction?

like
1
dislike
0
love
0
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0