सांझी पूजा, विलुप्त होती हुई एक परंपरा

सांझी पूजा, विलुप्त होती हुई एक परंपरा

घर घर तेरी जोत जले, सांझी माई तेरी जय... सांझी सांझी सबको दे मुराद मनमानी, सांझी तेरी जय, सांझी तेरी जय....

आरता री आरता सांझी माई आरता ...


नवरात्रि पर पूरे 9 दिन तक चलने वाले पर्व पर सांझी के गीतों का अपना विशेष महत्व है। इन गीतों को गाते हुए छोटे बच्चे जब हाथ में दीपक लेकर निकलते हैं तो मोहल्ले और गांव में पूरा माहौल भक्तिमय हो जाता था ।

शारदीय नवरात्र के आगमन के साथ घर घर सांझी के गीत सुनाई पढ़ते थे।

नवरात्र के साथ ही सांझी माता की पूजा शुरू हो जाती थी । नवरात्र से एक दिन पूर्व अमावस को लोग घर की दीवारों पर मिट्टी से बनाई गई आकर्षक मूर्तियां गोबर के साथ दीवार पर सजाते थे ।

नवरात्र से पहले अमावस्या को हर घर के बाहर दीवार की सफाई होती। दीवार लीपकर चूल्हे की पीली मिट्टी या गोबर से सांझी बनाते थे। उसे चूड़ी, कांच, बिंदी, कौढ़ी, सितारे, आटा, रोली, गेरु, रुई, धागे से सजाते। 


कभी तालाबों की मिट्टी से सांझी माई के साथ उनके भाई, आकाश में उड़ते तोते, वन में नाचता मोर, चांद, सूरज बनाए जाते थे,सांझी माई के साथ तोते जरूर बनाए जाते हैं। इन तोतों को सांझी के चारों और विशेष रूप से सजाया जाता है। तोते को एक ऐसा पक्षी माना गया है, यह जहां भी निवास करता है, वहां हरियाली और खुशहाली दोनों होती हैं।

सांझी माई के साथ सूरज, चांद, और सितारे भी बनाए जाते हैं जो स्थायित्व और ऊर्जा के रूप का प्रतीक माना गया।

यदि कोई व्यक्ति खेती करता है तो वह मां सांझी के साथ मिट्टी का हल भी बनाकर लगाता है। अगर कोई पुरोहित है तो वह पंडित का स्वरूप बनाता है। ऐसे में सांझी माई को देखकर उस परिवार के आर्थिक, सामाजिक ढांचे को समझा जा सकता था ।

कौन भाभी, ननद, बहन या रिश्तेदारी की महिला कितनी सुंदर सांझी सजाती है, यह आंका जाता था। कितना मधुर गीत गाती है, आरती गाने में कुशल है। इसी से बहुओं, बेटियों की कुशलता परखी जाती थी।


परंपरा अदायगी के लिए घरों में सांझी पूजन आज भी होता है, लेकिन गोबर नहीं मिट्टी की सांझी पूजी जाती है। उसने भी बनी बनाई बाजार से मूर्ति लाकर सजा दी जाती है।

कांच के टुकड़ों से सजी गोबर की सांझी अब मिट्टी की खूबसूरत प्रतिमा में ढल गई है। सौहार्द, एकता और त्योहारी उल्लास की प्रतीक सांझी अब रस्म निभाने तक शेष है।अब शहरों में पक्के, छोटे घर हैं। आंगन है नहीं तो सांझी कहां सजाएं। घर के अंदर ही या मंदिर में लोग बाजार से मिट्टी की सांझी लगाकर सजा लेते हैं।


सांझी माई को समृद्धि, उत्थान और उन्नति का प्रतीक और मां भगवती का ही रूप माना गया है। श्रद्धालुओं के घरों में सांझी के रूप में देवी नौ दिन तक निवास करती है।

नियम तो यह है कि घर के बाहर दीवार, आंगन में सांझी रखें। मंदिर के पास सांझी न रखें।

आधुनिकता के दौर में यह लोक कला लुप्त होती जा रही है।

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