सुकून ढूँढता नैराश्य

सुकून ढूँढता नैराश्य


सौ सालों से सुकून ढूँढता नैराश्य का अंधेरा मेरी धड़क के भीतर दीये की लौ सा फ़ड़फ़ड़ाता है..

एक कंधे का सहारा तलाशते दूर सुदूर जाती मेरी नजरों को पनाह चाहिए
उठा लो न अपनी पलकों पर मेरे सपनों को, बोझ हटे तो नींद का आगाज़ हो..

मेरी टूटी आस और छूटी उम्मीदों का एक धागा अपनी ऊँगलियों से जोड़ लो न एक महफ़ूज़ छत्तर की छाँह तले उम्र काट दूँ..

कहिए न अपनी कमिज़ को मेरे अश्रु की आगोश बन जाए, टपकता मेरी आँखों से पानी पनाह कमिज़ की पाते ही मोती बन जाए..

बैठी हूँ सदियों से सहरा के बीच एक कुआँ खोदते, नमी भर दो न हल्की सी उर में अपने साथ की, भरी हुई आँखों से अश्कों का नाता ही टूट जाए..

संसाररथी भले तुम ठहरे, पहिया दूसरा मेरी शख़्सीयत भी अहम् कहलाए, कदम से मेरे ज़रा कदम तो मिलाईये, मेरी ज़िस्त तो न ड़गमगाए..

कहाँ कुछ ज़्यादा मांग लिया चुटकी सिंदूर विद्यमान है तुम्हारे नाम का मेरी मांग में, मान रखते उस लाल रंग का हक हल्का सा दे दो ना।
भावना ठाकर 'भावु' बेंगुलूरु 

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