समीक्षा ना सही आलोचना ही कर दो

समीक्षा ना सही आलोचना ही कर दो


रे शब्दों के शामियाने तले आओ तो सही,सिर्फ़ मेरी शब्दों की बुनी हुई जाल में उलझ कर न रह जाओ, हर शब्दों से पसीजते स्पंदन को परवाज़ दो, उड़ने ना लगो भावनाओं की पतंग संग तो कहना।


मेरी रचनाएँ बहुत कुछ कहती है साहब ज़रा दिल की अंजुमन के कान लगाकर सुनों बह न जाओ अल्फाज़ों के समुन्दर में तो कहना।


पंक्तियों को पोरों से छूओ दर्द की कशिश तो कहीं खुशियों का जश्न मनाते मिलेगी व्यंजनाएं, पढ़ कर कभी हंस दोगे तो कभी आँसू ना बह निकले तो कहना।


विषयों की धुन पर नृत्य करते शब्दों से कभी मिलकर तो देखो, हर संज्ञा में खुद की कोई कहानी न पाओ तो कहना।


नहीं लिखती कुछ अटपटे भावों की कहानीयाँ, दुन्यवी गतिविधियों को शब्दों में पिरोकर तालमेल बिठाते लिख लेती हूँ आड़ी टेढ़ी लफ़्ज़ों की लड़ीयाँ समीक्षा ना करो ना सही, आलोचना पर भी मैं मुस्कुरा ना दूँ तो कहना।

#भावु

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