समाधान: Story by Archana Saxena

समाधान: Story by Archana Saxena

कल्पना जब ऑफिस से आई तो हर रोज की तरह बच्चों को मोबाइल फोन में गेम खेलते हुए ही पाया। पहले इस छोटी उम्र में फोन बच्चों के हाथ में वह कभी नहीं लगने देती थी, लेकिन जबसे ऑनलाइन पढ़ाई शुरू हुई, बच्चे हाथ से निकले ही जा रहे थे। लॉकडाउन के समय में जब तक कल्पना भी घर से काम कर रही थी तब तक भी स्थिति बेहतर थी, लेकिन जब से उसे ऑफिस जाना प्रारंभ करना पड़ा तब से बच्चों को रोकना असम्भव हुआ जा रहा था। यों उसके पति विशाल अभी भी वर्क फ्रॉम होम ही कर रहे थे, परंतु वह इतने व्यस्त थे कि सारा दिन लैपटॉप के सामने ही मुँह किए बैठे रहते। ऐसे में बच्चों का शोर मचाना उन्हें जरा भी न भाता। जब भी विशाल बच्चों को डाँटते बच्चे फोन हाथ में लेकर चुपचाप खेलने लगते। घर में शांति रहे इससे अधिक विशाल को कुछ नहीं चाहिए।


कल्पना अक्सर बच्चों व विशाल पर इसी बात को लेकर क्रोध करती थी लेकिन कोई हल नजर नहीं आता था। ऑफिस से आते ही घरवालों पर बरस पड़ना भी उसे अच्छा नहीं लगता था, और एक दिन तो छोटे बेटे ने कह ही दिया था


"क्या मम्मी, आते ही डाँटने लगती हो, आप ऑफिस में ही रहा करो, घर मत आया करो।"


बहुत बुरा लगा था उसदिन कल्पना को, सारा दिन मेहनत करके आती है और यहाँ किसी को उसके आने से खुशी ही नहीं होती। लेकिन बच्चा भी गलत नहीं कह रहा था। ऐसा तो आये दिन होता ही था।


बस तबसे कल्पना ने अपने क्रोध पर भी थोड़ी नकेल कसी। लेकिन जब भी बच्चों के फोन में बेल बीइंग चेक करती तो पाती कि दोनों ही दिन भर में दस से बारह घंटे मोबाइल का प्रयोग करते हैं। आधे समय पढ़ाई में और आधे समय गेम्स में, तब उसे अपनी परवरिश पर निराशा होती।


धीरे धीरे बच्चे सिरदर्द व ठीक से दिखाई न देने की शिकायतें भी करने लगे थे। कुछ ही दिनों में दोनों बच्चों की आँखों पर चश्मा भी चढ़ गया था। कुछ दिन विशाल ने बच्चों के साथ अतिरिक्त सावधानी बरती, लेकिन फिर वही ढर्रा प्रारंभ हो गया।


देर रात तक वह किसी सोच में डूबी रही। सुबह उठ कर नौकरी छोड़ने का ऐलान कर दिया। अचानक लिए इस फैसले से विशाल ने नाखुशी जताई।


"घर के लिए लोन लिया हुआ है कल्पना, बच्चों की इतनी फीस जाती है, एक तनख्वाह में कैसे मैनेज हो पाएगा?"


"जिन बच्चों की फीस की इतनी चिंता है उनकी सेहत का जरा भी ख्याल नहीं है तुम्हें विशाल? दिन भर बैठे बैठे गेम खेलते हैं, आँखों पर चश्मा चढ़ गया, शरीर भारी होता जा रहा है। क्या ऐसा ही बनाना चाहते थे हम अपने बच्चों को?"


"बात गलत नहीं है तुम्हारी परंतु जल्दबाज़ी ठीक नहीं है। कोई हल सोचते हैं मिलकर।मैं भी बच्चों पर अब से जितना हो सकेगा ध्यान दूँगा"


बच्चे भी खुश नहीं दिख रहे थे। चौबीस घंटे मम्मी नजरों के सामने रहेंगी तो रोकटोक के सिवा और क्या करेंगी?


उन्होंने आश्वासन देना चाहा


"आप नौकरी मत छोड़ो, हम गेम खेलना कम कर देंगे।"


गेम खेलना कम करने का वादा पहले भी कई अवसरों पर कर चुके थे वह परंतु निभाया कभी नहीं। अतः कल्पना को इसबार भरोसा था ही नहीं। कुछ सोचती हुई बोली।


"अच्छा ठीक है, मैं तीन महीने की छुट्टी लेती हूँ। अगर मुझे लगा कि तुम सब अपनी बात पर कायम रहे मैं इस्तीफा नहीं दूँगी।"


उस दिन से कल्पना ने तीन महीने की छुट्टी ले ली। मन ही मन वह भी जानती थी कि जो वादा ये लोग कर रहे हैं उसे निभाना इतना भी आसान नहीं है। जो गलत आदतें पड़ चुकी हैं उसे छुड़वाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी।

उसी दिन कल्पना ने ऐलान कर दिया।


"स्कूल के बाद दोनों बच्चे पापा

के पास मोबाइल जमा करा देंगे और मेरे साथ कैरम लूडो या साँपसीढ़ी खेलेंगे। फिर शाम को छत पर हम सब योगासन और प्राणायाम करेंगे। उसके बाद तुम दोनों होमवर्क करोगे और फिर रसोई में मेरी मदद करोगे।


बच्चों को सुनने में मजा नहीं आया पर कोई चारा भी नहीं था। कल्पना पूरे धैर्य के साथ पेश आ रही थी। धीरे धीरे बच्चे

नए क्रियाकलापों से आनंदित होने लगे।


दो महीने बीत गए थे और छुट्टी का एक महीना ही बाकी था। कल्पना को फ्रिक थी कि उसके नौकरी पर लौटते ही सब पहले जैसा न हो जाए।

उसने कुछ दिनों के लिए ससुराल जाने का फैसला किया। बच्चे दादा दादी के पास पहुँच कर बहुत खुश थे।


अकेले में कल्पना ने उनसे बात करके सारी बातों से अवगत कराते हुए उनकी मदद माँगी।


"मैं जानती हूँ कि आप दोनों को अपना घर ही अधिक भाता है और अधिक दिनों तक आपका कहीं भी मन नहीं लगता। लेकिन आपके बच्चों और पोतों को आपकी मदद की आवश्यकता है। अपने पोतों को एक अच्छा और जिम्मेदार नागरिक बनाने में मेरी सहायता करें। कम से कम जब तक विद्यालय सही तरीके से न खुल जाए तब तक तो हमारे साथ चल कर रहिए।"


"कैसी बातें करती हो बहू। हम अपनी गलती मानते हैं, हमने अपने बच्चों को संयुक्त परिवार में बड़ा किया है, कब बच्चे बड़े हो गए पता ही नहीं चला। लेकिन तुम घर परिवार और नौकरी सबकी जिम्मेदारी निभा रही हो तो हमें तुम्हारी मदद करनी ही चाहिए थी। जैसे हम कभी कभी तुम्हारे पास मन बदलने के लिए रहने आते हैं, वैसे अब हम यहाँ आकर रहा करेंगे। अधिकांश अब हम अपने घर में अपने बच्चों के साथ ही रहेंगे। आखिर ईंट पत्थर से बने इस घर का मोह अपने बच्चों से अधिक तो नहीं होना चाहिए हमें भी।"


बच्चे प्रसन्न थे, दादा दादी हमेशा के लिए साथ रहने आ गए थे। अब कैरम हो या लूडो, साँपसीढ़ी हो या योग, वह दोनों बच्चों के साथ उसमें सम्मिलित रहते। बच्चों को मोबाइल की याद तक नहीं आती।

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