सम्पूर्ण हुआ मेरा अस्तित्व जब पहली बार सुना माँ

शादी के बाद हर स्त्री चाहती है कि उसको पूरे परिवार का स्नेह  व ममता मिले। जितना ममत्व  दुलार और अपनापन वह अपने परिवार को देती है उतना ही प्रेम व आदर वह पाये। पर हर स्त्री की किस्मत मे ये सुख हो ,जरूरी नही ।खासकर जब वह  स्त्री दूसरी माँ  बनकर किसी परिवार में प्रवेश करती है। तो पढ़िये आराधना की कहानी मेरी जुबानी।

सम्पूर्ण हुआ मेरा अस्तित्व जब पहली बार सुना माँ

शादी के बाद हर स्त्री चाहती है कि उसको पूरे परिवार का स्नेह  व ममता मिले। जितना ममत्व  दुलार और अपनापन वह अपने परिवार को देती है उतना ही प्रेम व आदर वह पाये। पर हर स्त्री की किस्मत मे ये सुख हो ,जरूरी नही ।खासकर जब वह  स्त्री दूसरी माँ  बनकर किसी परिवार में प्रवेश करती है। तो पढ़िये आराधना की कहानी मेरी जुबानी।

आराधना माँ नही बन सकती थी।यह उसके परिवार को उसके विवाह से पहले ही पता था।इसलिये उन्होने हमेशा उसके लिये ऐसे लड़के की खोज की जिन को पत्नी के साथ साथ एक माँ  की  भी जरूरत हो।कह सकते हैं कि उन्हे पता था कि उनकी बेटी दूसरी माँ और पत्नी  बनकर ही किसी का घर रोशन कर सकती है।हुआ भी यही आराधना कि बुआ ने कोई रिश्ता बताया जिनके बच्चे थे  आठ और दस साल के।बीबी की तेज़ बुखार बिगड़ जाने से मृत्यु हो गई थी और बच्चों व घर संभालने के लिये शादी बहुत जरूरी थी।लड़के वालों से बातचीत होकर आनन फानन में आराधना की शादी अंकुश के साथ हो गई।
सास, ससुर , पति सभी से स्नेह और प्यार मिलता पर  एक दूरी रखते अंकुश के बच्चे आराधना से। लाख कहने पर भी माँ नही कहते ।हमेशा आंटी करके बात करते।आराधना कोई बीस बाइस साल की लड़की तो थी नही वह थी तीस बत्तीस साल की एक परिपक्व महिला। हर हाल कोशिश करती बच्चों के करीब आने की।सुबह उठकर उनकी पसंद का टिफिन तैयार करने से लेकर दोपहर मे उनके आने तक उनकी पसंद का खाना तैयार रखती। हर सन्डे अंकुश को कहकर बच्चों को मॉल वगैरह ले जाती डिनर  पर उनके मन पसंद रेस्टो ले जाती।
सासू माँ से उसने बच्चों की पसंद नापसंद अच्छी तरह से समझ लीं थीं। पर बच्चे हर सन्डे उसी शहर मे अपनी नानी के घर जाना ज्यादा पसंद करते।एक दिन उसने पिकनिक की पूरी तैयारी कर ली और बच्चों को कहा-मिष्ठी, श्रीहान आज आप मम्मी पापा के साथ पिकनिक पर चलेंगे न।चलो दोनो तैयार हो जाओ।फिर उसकी सासू जी ने कहा -दादी बाबा भी चल रहे हैं।दोनो बच्चे आराधना को बोलने लगे आपने हमारे पापा को भी अपना बना लिया अब दादी दादू को भी अपनी साइड कर लिया।हमें कहीं नहीं जाना !
इतने छोटे बच्चों के मुँह से ये बातें सुनकर पूरा घर स्तब्ध रह गया ।आखिर क्या कमी रह गई मेरे प्यार में आराधना सोंच में पड़ गई।उस रात वह बहुत रोई।जिस ममत्व को वह दिल जान से लुटा रही थी ।बच्चों की नज़र में सब बेमानी था।बहुत कहा था सासू माँ ने अंकुश से हनीमून पर जाने को। आराधना के हिस्से की खुशियाँ उसको देने को।पर आराधना ने बच्चों की वज़ह से मना कर दिया था।वह चाहती थी बच्चे उसे दिल  से अपना लें।माँ कहें।
आज अंकुश की पहली ससुराल में कोई फंक्शन था ।ये पहली बार था कि जब आराधना भी उस परिवार के साथ थी। सभी ने उसका स्वागत किया ।बस मिष्ठी की मामी कुछ अजीब सा व्यवहार कर रहीं थीं उसके साथ। खैर  वह वापस आ गए।
आज सुबह से आराधना को तेज़ बुखार था ।अंकुश  फैक्ट्री चले गये थे और बच्चे स्कूल।उसने दवाई ले ली थी।सासू माँ ने भी सख्त हिदायत दी थी आराम करने की सो वह अपने कमरे में आराम कर रही थी।बच्चे स्कूल से आये ।घर में सन्नाटा सा लगा दोनो को।आज उनकी आराधना आंटी की कोई आवाज जो सुनाई नही पड़ी ।नही तो मिष्ठी, श्रीहान के स्कूल से आते ही वह आगे पीछे घूमती थी। गुड़िया खाना लगाऊँ,,, ,,,!श्रीहान का मन पसंद लंच है आज ,वगैरह,,वगैरह । झाँक कर कमरे मे देखा ।आराधना सो रही थी।दोनो बच्चे पास गये और सर दबाने लगे।बच्चों का स्पर्श आराधना को किसी दैवीय स्पर्श से कम नही लगा।हम आपको कहीं नही जाने देगें।आप जल्दी से ठीक हो जाओ आंटी,,,,,,,मासूम श्रीहान सोती आराधना के चेहरे की तरफ देखकर कह रहा था।आंटी नही  "माँ" आराधना बुदबुदाई।मिष्ठी ने श्रीहान को देखा और श्रीहान ने अपनी दीदी को और दोनो बच्चे "माँ" कहते हुए उसके गले लग गये। आज आराधना को अपना बीमार पड़ना भी ईश्वरीय कृपा लग रहा था।
शाम को उसका टैम्प्रेचर भी कम था चेहरे पर अलग ही नूर था ।एक संतुष्टि थी। टेबल पर खाना सर्व करते हुए  सासूमाँ ,ससुर जी का स्नेहिल चेहरा ,दोनो बच्चों के चेहरों पर उमड़ते प्रेम और ममता के भाव और अंकुश के सानिध्य से आराधना आज अपना अस्तित्व संपूर्ण महसूस कर रही थी।आखिर उसे अब सही मायनों में  "माँ" बनने का सौभाग्य भी मिल गया था।

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