सांता क्लाज़ पुरुष ही क्यों स्त्री क्यों नहीं???

सांता क्लाज़ पुरुष ही क्यों स्त्री क्यों नहीं???

कक्षा छात्रों से भरी हुई थी और तभी अध्यापिका जी का प्रवेश हुआ जो क्रिसमस से एक दिन पहले सभी बच्चों को क्रिसमस के बारे में बता रही थीं "हाथों में घंटी बजाता, सफेद मुलायम बड़ी बड़ी दाढ़ी वाला, लाल वस्त्र पहन तथा वस्त्रों के ऊपर सफेद बेल्ट बांधे, काले गमबूट पहने और लाल सफेद फुंदरू वाली टोपी पहने अपने रथ पर बैठे जिन्हें रेनडियर चलाते हैं और साथ ढेरों उपहार लिए आकाश मार्ग से सबको उपहार बाँटने सांता क्लाज़ आता है और हम क्रिसमस मनाते हैं तो बताओ किस किस के घर में क्रिसमस में सांता क्लॉस आए" 

तभी एक बच्चे ने पूछा "टीचर टीचर यह बताइए संता क्लॉज हमेशा आता क्यों है आती क्यों नहीं होता?? सांता क्लाज़ पुरुष ही क्यों स्त्री क्यों नहीं?? क्या कोई महिला संता क्लाज़ नहीं हो सकती??" 

टीचर ने कहा "बिल्कुल हो सकती है। यहां हम किसी आदमी या औरत की बात नहीं कर रहे यहां हम बात कर रहे हैं उस इंसान कि जो जरूरतमंदों की मदद करते हैं। संता क्लाज क्या करते थे लोगों की मदद करते थे और जो लोग दूसरों की मदद करते हैं। दूसरों को भोजन देते हैं। दूसरों को वस्त्र देते हैं वही तो सांता क्लाज़ कहलाते हैं। जरूरतमंद लोग तो कोई भी हो सकते हैं बेटा। उदाहरण के तौर पर आपकी मम्मा आपको भोजन पका कर खिलाती है रोज आपकी वस्त्र धोती है और आपको होमवर्क करवाते हैं और भी कई चीजें वह आपकी जरूरत के समय काम आती है तो वह सैंटा क्लॉज़ हुई ना आपकी।"

"पर टीचर सैंटा क्लॉज़ तो गिफ्ट लेकर आते हैं और वह तो हमारे पापा लाते हैं" "पर बेटा आपकी मम्मा जो आपके लिए घर में जो सामान लाते हैं उनसे आपकी जरूरतें पूरी करते हैं तो आपकी मम्मा पापा दोनों ही सैंटा क्लॉज़ हुए ना बच्चों।" 

उपस्थित क्लास कक्षा में बच्चों को यह बात समझ आते ही सभी तालियाँ बजाने लगे और क्रिसमस कैरोल गाने लगे। 

तो अब नहीं कहेंगे ना कि सैंटा क्लॉस आदमी है या औरत आदमी औरत से कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है आपके कर्मों से आप जो अच्छा सोचते हैं आपके सोचने से और जो भी इंसान जरूरतमंद इंसानों के बारे में सोचता है। उनके काम आता है वही सैंटा क्लॉज़ कहलाता है चाहे वह फिर औरत हो या आदमी।

बचपन से हम सभी यही देखते और सुनते बड़े हुए हैं तथा अपने आगे आने वाली पीढ़ीयों को भी यही सुनाते और दिखाते जा रहे हैं। 

क्रिसमस या बड़ा दिन ईसा मसीह या यीशु के जन्म की खुशी में मनाया जाने वाला पर्व है। यह 25 दिसम्बर को पड़ता है और इस दिन लगभग संपूर्ण विश्व मे अवकाश रहता है। 

बहुत समय पहले, नाजरेथ नामक एक जगह थी जहाँ मरियम (मैरी) नाम की एक महिला रहती थी। वह बहुत मेहनत थी और दूसरों के लिए भी अच्छी थी। वह यूसुफ नामक एक आदमी से प्यार करती थी जो एक बहुत अच्छा युवा था। एक दिन, ईश्वर ने एक सन्देश के साथ गेब्रियल नामक परी को मरियम के पास भेजा। उसने उसे बताया की ईश्वर लोगों की सहायता के लिए धरती पर एक पवित्र आत्मा भेज रहा है। वह आत्मा मैरी के बेटे के रूप में पैदा होगी और उसे यीशु नाम देना।

मैरी यह सुनकर चिंतित हो गई की उसके अविवाहित होते हुए यह कैसे हो सकता है। परी ने उससे कहा की यह ईश्वर की तरफ से एक चमत्कार होगा तुम्हें इसके बारे में ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है। उसने यह भी बताया की एलिज़ाबेथ नाम के उसके चचेरे भाई जिनके बच्चे नहीं थे वे जॉन बैपटिस्ट नाम एक बच्चे को भी जन्म देंगे जो यीशु के जन्म के लिए रास्ता तैयार करेगा।

यह सुनकर मैरी ईश्वर इच्छा से सहमत हो गई। वह एलिज़ाबेथ से मिलने गई और तीन महीने बाद वापस लौट आई। तब तक वह गर्भवती हो चुकी थी। इससे यूसुफ चिंतित था और उसने मरियम से शादी नहीं करने के विचार शुरू किए। लेकिन एक रात सोते समय, एक परी यूसुफ को सपने भी दिखाई दी, उसने उसे ईश्वर की इच्छा के बारे में बताया। यूसुफ अगली सुबह उठा और उसने फैसला लिया की वह मैरी को अपनी पत्नी बना लेगा।

शादी के बाद यूसुफ और मरियम बेथहलम चले आए। जब वे वहां पहुंचे तो उन्होंने पाया की वहां भीड़ बहुत थी और उनके रहने के लिए वहाँ कोई जगह नहीं बची। इसलिए उन्होंने एक जानवरों के खलिहान में रहने का फैसला किया। वही पर मरियम ने ईश्वर के पुत्र को जन्म दिया और उसे यीशु नाम दिया।

ईश्वर ने यीशु का जन्म आकाश में एक उज्ज्वल सितारे द्वारा संकेतित किया। दुनिया के विभिन्न हिस्सों के बुद्धिमान पुरुषों ने इस सितारे के महत्व को समझ लिया था। उन्होंने यीशु के जन्मस्थान तक पहुंचने के लिए उस तारे का पालन किया। वे बच्चे और उसके माँ-बाप के लिए उपहार लेकर आए। बेथहलम के अन्य हिस्सों में, जहाँ चरवाहे अपने जानवर चरा रहे थे। स्वर्गदूत उन्हें अच्छी खबर देने लगे। उन्होंने दुनिया पर पवित्र आत्मा का स्वागत करने के लिए गाने गाये और यीशु के जन्म का आनंद लिया।

यीशु जब बड़े हुए तो उन्होंने पूरे गलीलिया में घूम−घूम कर उपदेश दिए और लोगों की हर बीमारी और दुर्बलताओं को दूर करने के प्रयास किए। धीरे−धीरे उनकी प्रसिद्धि चारों ओर फैलती गई। यीशु के सद्भावनापूर्ण कार्यों के कुछ दुश्मन भी थे जिन्होंने अंत में यीशु को काफी यातनाएं दीं और उन्हें क्रूस पर लटकाकर मार डाला। लेकिन यीशु जीवन पर्यन्त मानव कल्याण की दिशा में जुटे रहे, यही नहीं जब उन्हें कू्रस पर लटकाया जा रहा था, तब भी वह यही बोले कि 'हे पिता इन लोगों को क्षमा कर दीजिए क्योंकि यह लोग अज्ञानी हैं।' उसके बाद से ही ईसाई लोग 25 दिसम्बर यानि यीशु के जन्मदिवस को क्रिसमस के रूप में मनाते हैं।

 लोग यीशु मसीह के जन्म का जश्न मनाने के लिए मध्यरात्रि में चर्च जाते है। उपहार का आदान-प्रदान करते है, कैरल गाते है, नए कपड़े पहनते है और हर्षोल्लास से क्रिसमस मनाते है। सांता क्लॉज़ (जिसे क्रिसमस का पिता भी कहा जाता है हालांकि, दोनों का मूल भिन्न है) क्रिसमस से जुड़ी एक लोकप्रिय पौराणिक परंतु कल्पित शख्सियत है जिसे अक्सर क्रिसमस पर बच्चों के लिए तोहफे लाने के साथ जोड़ा जाता है।

हम सबकी सोच यहीं तक सीमित रह गई कि क्रिसमस पर सांता आता है और उपहार लाता है परंतु जिस वजह से यीशू इस धरती पर जन्म लेकर सबको बताने आए थे कि इश्वर, अल्लाह, मसीहा सब एक हैं। हम सब इंसान चाहे औरत हो या आदमी सब उस परमात्मा की संतान हैं। वो किसी ने भी ना जाना। वो बस यही कहते थे हम सब भाई भाई हैं जिसकी ओर किसी ने भी ध्यान नहीं दिया और इसी लिए उन्होंने सूली पर लटकते वक्त भी यही कहा कि "हे प्रभु अज्ञानी लोगों को क्षमा कर दें" यहां अज्ञानी लोगों से मतलब इसी बात से था कि सब धर्म को बढ़ावा देते हुए एक दूसरे के खून के प्यासे हैं। 

इसी प्रकार सांता क्लाज़ आता है जिन्होंने ज़रूरत मंदों की मदद की और उसके साथ सबको मैरी क्रिसमस कहकर भी तो विश करते हैं क्योंकि मैरी ही यीशू की माता थीं जिनकी वजह से यीशू का जन्म हुआ और इश्वर का ये नेक बंदा धरती पर संदेश देने आए कि खुदा एक है और हम सब उसके बच्चे हैं। तो हमें सांता में कोई आदमी या औरत की छवी न देखकर सांता और यीशू द्वारा किए गए महान कर्मों को देखना व करना चाहिए। ज़रूरत मंदों की मदद करनी चाहिए। सबको भाई बंधू मानकर जग में शांति स्थापित करनी चाहिए तभी क्रिसमस के इस पर्व का सही उद्देश्य पूर्ण होगा।

पढ़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। आपकी अभिव्यक्ति का इंतजार रहेगा।

वाणी राजपूत

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