सप्तपदी

सप्तपदी

ससुराल में पहला दिन एवम् गर्भावस्था विषय पर लेख लिखते-लिखते मेरे मन में विचार आया कि इन सब पर लिखने का अवसर देने वाला जो संस्कार है अर्थात 'विवाह संस्कार' उसके विषय में भी कुछ लिखा जाए।

विवाह संस्कार हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण संस्कार है। यह एक प्रकार से वर और कन्या को गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने की सामाजिक स्वीकृति देना है, जो आत्मिय जनों के आशीर्वाद और शुभकामनाओं के साथ पूर्ण होता है।

विवाह संस्कार की अनेक रस्में होती हैं जैसे भांवर पड़ना, सप्तपदी, कन्यादान आदि अलग-अलग क्षेत्रों में इनके रूपों में कुछ परिवर्तन पाए जाते हैं। आइए थोड़ी जानकारी प्राप्त करते हैं सप्तपदी और विवाह के प्रकार के बारे में-

सप्तपदी हिन्दू विवाह का सबसे महत्वपूर्ण चरण है। इसमें वर उत्तर दिशा में कन्या को सात मंत्रों के द्वारा सप्त मण्डलिकाओं में सात पदों तक साथ ले जाता है। अग्नि की चार परिक्रमाओं से यह कृत्य अलग है। जिस विवाह में सप्तपदी होती है, वह 'वैदिक विवाह' कहलाता है।

सप्तपदी वैदिक विवाह का अभिन्न अंग है। इसके बिना विवाह पूरा नहीं माना जाता। सप्तपदी के बाद ही कन्या को वर के वाम अंग में बैठाया जाता है। हर कदम में एक प्रण लिया जाता है जिनके पालन से गृहस्थ जीवन मधुर और सुचारू रूप से चलता है। पहला कदम अन्न वृद्धि के लिए होता है, दूसरा कदम शारीरिक और मानसिक बल की वृद्धि के लिए, तीसरा कदम धन की वृद्धि के लिए, चौथा कदम सुख की वृद्धि के लिए, पाँचवाँ कदम परिवार पालन का है, छठा कदम ऋतुचर्या के लिए होता है, सातवाँ कदम दोनों के मध्य मित्रता का भाव रखने सम्बन्धित होता है। इस तरह सात वचनों में बंधकर वर -वधू अपने जीवन का एक नया अध्याय जोड़ते हैं।

विवाह के प्रकार-

1. ब्रह्म विवाह- आजकल प्रचलित विवाह ब्रह्म विवाह का ही रूप है, जिसमें वर और कन्या का विवाह दोनों पक्षों की अनुमति से तय किया जाता है।
2. दैव विवाह- इस विवाह में अपनी कन्या को किसी काम के बदले में मूल्य के रूप में दान में दे दिया जाता है।
3. आर्ष विवाह- वधू के बदले वधू पक्ष वालों को कुछ मूल्य चुकाया जाता है, इस प्रकार से हुए विवाह को आर्ष विवाह कहते हैं।
4. प्रजापत्य विवाह- इस तरीक़े से किए गए विवाह में कन्या की सहमति के बिना ही उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के पुरूष से करवा दिया जाता है।
5. गंधर्व विवाह- वर और कन्या घर वालों की सहमति के बिना और किसी रीति-रिवाज का पालन किए बिना जो विवाह करते हैं वह गंधर्व विवाह कहलाता है।
6. असुर विवाह- लड़की को खरीद कर उसके साथ विवाह करना असुर विवाह की श्रेणी में आता है।
7. राक्षस विवाह- कन्या की सहमति के बिना उसका बलपूर्वक अपहरण करके विवाह करना राक्षस विवाह कहलाता है।
8. पैशाच विवाह- कन्या से लाचारी की स्थिति में अनुचित रूप से शारिरिक सम्बन्ध बना लेना और विवाह करना पैशाच विवाह कहलाता है।

~सुमेधा

(विभिन्न स्त्रोतों से साभार)

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