संस्कार से बड़ी कोई धरोहर नहीं - परवरिश और संस्कार

संस्कार से बड़ी कोई धरोहर नहीं - परवरिश और संस्कार

धरोहर के रूप में तो मेरे पास, माँ -पापा के दिये संस्कार ही हैं, जो हर बच्चें को उसके माँ -बाप देते हैं,। ये अलग बात हैं,कि कौन बच्चा उसे किस रूप में ग्रहण करता हैं..।



यूँ तो मेरे माँ -पापा,दोनों,अपने ऊपर सबसे कम खर्च करते थे.। पर माँ का बचत का तरीका बहुत अलग था..। दोनों पहले बच्चों का सोचते, बच्चें बड़े हो गये, तो भी उनका अंदाज नहीं बदला..। हाँ उनके बच्चें पहले डबल फिर तीन गुना बढ़ते गये..। पर माँ -पापा का वात्सल्य बढ़ता गया..।उनका बहू और बेटी के बीच सामंजस्य,बेमिसाल था..।सबको जोड़ कर रखने का हुनर, उन्हे स्पेशल बनाता था..।कभी खाली ना बैठने वाले हमारे पिता, हमसबको गप्पे मारते देखते तो, गुस्सा करते, समय कि कीमत समझो उसे बर्बाद मत करो..।


पापा जो घड़ी पहनते थे, वो उनके एक दोस्त ने दिया था.। ऊपर छोटी सी गोल घुमानें वाली सुनहरी कील , चाभी भरने वाला था, जिसे घुमा कर चाभी भरने से, घड़ी दिन भर चलती थी..। आज कल तो बैटरी वाली घड़ियाँ आतीं हैं, पर उस समय की घड़ियाँ कुछ अलग होती थी...। पिता के सामानों में वो घड़ी आज भी,भाई के पास सुरक्षित हैं...। पापा के जाने के बाद भी काफी दिन तक उसे चाभी भर कर जीवित रखा गया..। पर अब वो भी शांत हो गया..। हम सब जब भाई के घर जाते तो एक बार घड़ी जरूर निकाल कर,पिता की उपस्थिति को महसूस करते और नम आँखों से उसे वापस रख देते..।


माँ को सिक्के इकट्ठा करने का शौक था..। उनके पास मिट्टी का गुल्लक था, जो पैसा मिलता, सब उसमें डाल देतीं थी.।हम सब भाई -बहन पूछते भी आप एक रुपया भी गुल्लक में क्यों डालती हैं..। उनका कहना था बूंद- बूंद से सागर भरता हैं..।बहन की शादी में उनके सागर से काफी मोटी रकम उसमें से निकली..। समय के साथ, उनका गुल्लक, छोटे पर्स में बदल गया..। सिक्के, नोट सब उसीमें रखती थी, और अपने संदूक में कपड़ों के नीचे छुपा कर रखती थी..। उनका वो सिक्के वाला पर्स भी सुरक्षित हैं..।मैंने भी बचत के नायाब तरीके उन्ही से सीखा, वो शगुन में मिले पैसे भी, सब इक्कठा करती थी,बाद में किसी बड़े काम के लिये, निकालती थी..। मै भी शगुन या पुरुस्कार, या कोई और पैसा, भले ही वो पांच रुपया क्यों ना हो सब, एक पोटली में डालती हूँ, फ़ायदा ये हैं, जब मुझे चिल्लर की जरूरत होती तो मै उसमें से निकालती जरूर हूँ,.पर बड़ा नोट रख कर ही..।जिससे मेरा खजाना कम ना हो..।


मेरा ये मानना हैं,।माता -पिता के दिये संस्कार से बड़ी कोई धरोहर नहीं हैं..।हमारी परवरिश के रंग भी, हमारी धरोहर हैं, तभी तो हर व्यक्ति अपना बचपन याद कर मुस्कुरा उठता हैं..।धन आता हैं, और चला जाता हैं, पर संस्कार आपके साथ हमेशा रहता हैं.. आपसे आपके बच्चों को.,.. पीढ़ी दर पीढ़ी धरोहर के रूप में जाता हैं..।

        


 संगीता त्रिपाठी


  #माता -पिता की धरोहर

  #पांच दिन, पांच ब्लॉग 


            


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