सोशल डिस्टंस का मारा एक रिश्ता

सोशल डिस्टंस का मारा एक रिश्ता


महामारी, सोशल डिस्टंस और लाॅक डाउन ने इंसानों को सिर्फ़ आर्थिक और मानसिक रूप से ही परेशान नहीं किया, पति पत्नी के शारीरिक संबंध पर असर करके दिलों में दूरियां भी भरकर डिस्टंस पैदा कर दिया।


वंदना और विजय लगभग सुखी दांपत्य जीवन जी रहे थे विजय प्राइवेट कंपनी में हेड क्लर्क की नौकरी कर रहा था वंदना के सपने थोड़े ऊँचे थे, पर विजय की आय इतनी भी नहीं थी की वंदना को हाईफाई लाइफ़ स्टाइल दे सकें। इस वजह से वंदना थोड़ी असंतोष लिए जी रही थी। इतने में कोरोना के कहर के चलते लाॅक डाउन लग गया, कई कंपनियों ने अपने एम्पलोयस को छूटा कर दिया, उसमें विजय को भी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। उस वजह से विजय अवसाद का भोग बन गया।


आर्थिक तंगी ने मानसिक तौर पर भी निकम्मा कर दिया। कहीं जी नहीं लगता विजय थोड़ा चिड़चिड़ा भी हो गया। ऐसे में वंदना को छूना तो दूर करीब जाने से भी कतराने लगा। वंदना वैसे भी विजय से खुश नहीं थी.... मानसिक तौर पर डिप्रेश वंदना कुछ पल खुशी के ढूँढते विजय के साथ छेड़-छाड़ करते कोशिश करती विजय के नज़दीक जाने की, पर विजय बहाना बनाकर परे हो जाता और वंदना समुन्दर के इतने करीब रहकर भी खुद को प्यासा महसूस करती।


जवान तन की और भी जरूरतें होती है। ऐसे में एक दिन विजय बाहर से आया तो वंदना को पड़ोसी के लड़के के साथ अजीब हालत में देख लिया तो विजय गुस्से से आगबबूला हो उठा। वंदना तुझमें शर्म नाम की चीज़ है कि नहीं ये क्या कर रही हो। मेरी इज्जत का कुछ तो ख़याल करो। इतना सुनते ही वंदना भी चिल्लाई मिस्टर विजय एक साल हो गया, आख़िर मैं भी इंसान हूँ पेट की भूख के साथ इंसान को तन की भूख भी जलाती है समझे। तुम तो नौकरी के चक्कर में आर्थिक, शारीरिक और मानसिक रुप से बिलकुल हार गए हो मैं अपनी कामेच्छा को कैसे दबाऊँ। जवान हूँ, खूबसूरत हूँ मेरे दिल में भी अरमान है तुमने आज तक मुझे दिया ही क्या है, अपने शौक़ मारकर आज तक पैसों की तंगी तो बरदाश्त करती रही।


सोशल डिस्टंस को तुमने कुछ ज़्यादा ही सीरियस ले लिया, तुम तो भूल ही गए की शादीशुदा हो, जवान बीवी की भी जरूरतें होती है। एक साल से तुमने मुझे छुआ नहीं मेरी भावनाएं तड़प रही थी तो क्या करती बताओ? विजय को अपनी गलती का अहसास हो गया वंदना सही थी, अपने मानसिक तनाव को शरीर पर हावी करते मैंने वंदना के साथ अन्याय किया। हर एक के जीवन में आज इस अनमने समय ने अवसाद भर दिया है एक मैं ही तो समय का मारा नहीं, ये समय भी गुज़र जाएगा इसके चलते दिलों में दूरियां बना लेना ठीक नहीं। अपनी भूल कुबूल करते विजय ने वंदना को बाँहों में भर लिया और सौरी बोलते नम आँखों से इश्क का समुन्दर प्यासी नदी पर बरस पड़ा।


(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु

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