स्त्री जीत कर भी क्यों हार जाती..-महिला दिवस विशेष

स्त्री जीत कर भी क्यों हार जाती..-महिला दिवस विशेष

छनाक की आवाज सुन कर रमा जी भागी -भागी बाहर के कमरे में आई, सामने बहू पाखी का लैपटॉप टूटा पड़ा था, कोने में थरथर कांपती पाखी आँखों में आंसू भरे खड़ी थी।रमा जी समझ गई आज फिर बेटे -बहू में झगड़ा हुआ।

"तू जॉब छोड़ क्यों नहीं देती, जब प्रसून को पसंद नहीं तेरा जॉब करना तो क्यों कर रही "रमा जी खींझते हुये बोली। पाखी ने एक नजर उन पर डाली और अपने कमरे में चली गई।


 ये हैं पाखी और प्रसून की कहानी,दोनों हीं पढ़े -लिखें और जॉब वाले हैं।प्रसून जब पहली बार पाखी को देखने गया था।उसके सलोने रूप पर आकर्षित हो गया। उसकी माँ को पाखी पसंद नहीं आई। हमारे समाज में आज भी बहू का गोरा रंग, सबसे बड़ा गुण माना जाता, भले हीं नक्श और स्वभाव कैसा भी हो। पाखी का रंग थोड़ा कम था, पर तीखे नयन -नक्श किसी को भी अपनी तरफ आकर्षित करने में पूरी तरह से सक्षम थे। प्रसून को रमा जी ने बहुत समझाया। प्रसून जिद पर अड़ गया -ये रंग -वंग की बातें आपके ज़माने में चलती थी, अब नहीं मानता कोई..। हार कर रमा जी ने प्रसून की शादी पाखी से कर तो दी, अपने तमाम गुणों के बावजूद पाखी रमा जी का मन नहीं जीत पाई। दो बात थी, इसके पीछे,पहली पाखी का रंग कम होना। दूसरी बेटे की जिद से उन्हें लगा, पाखी ने उनसे उनका बेटा छीन लिया। साथ रहते हुये भी उन्होंने पाखी को कभी बहू का दर्जा नहीं दिया।जब भी अवसर मिलता वो पाखी को प्रताड़ित करने से कभी नहीं चुकती। अक्सर सासो को बेटे की शादी के बाद लगता बहू उनके बेटे को छीन लेगी। बेटे की कमियाँ ना देख वे बहू को कमियों का पिटारा समझने लगती।


विवाहउपरान्त पाखी और प्रसून की विवाहित जिंदगी सुखमय चलने लगी।कहते हैं ना सुख एक हीं जगह पर ज्यादा दिन नहीं रहता। प्रसून में एक कमी थी। वो था उसका शक्की होना। पाखी का व्यक्तित्व प्रसून से बीस हीं था।लोग पाखी की ज्यादा तारीफ करते, जो अब प्रसून को चुभने लगा। पाखी को कमतर जताने के लिये,प्रसून गाहे -बगाहे पाखी का मजाक सबके सामने उड़ाता था। पाखी को बुरा तो लगता था, पर घर की शांति के लिये अनदेखा कर पाखी अपने मृदु व्यवहार से प्रसून को संभाल लेती थी। गृहस्थी की गाड़ी चल रही थी। समय के साथ प्रियम और प्रीत दो बच्चे भी आ गए। प्रियम बड़ा था और प्रीत छोटी थी। पाखी अपनी नौकरी, घर और बच्चों में उलझी थी। तभी छटनी में प्रसून की नौकरी चली गई।प्रसून और ज्यादा शक्की और बदमिजाज होता गया। अपनी कुंठा और अहं को वो पाखी को प्रताड़ित करके दूर करता । हीनभावना अपनी विजय के लिये कोई भी रास्ता अख्तियार कर लेती हैं।पाखी के लिये प्रसून सिरदर्द बनता जा रहा था। सहेलियां कहती -क्यों बर्दाश्त करती हो। पढ़ी -लिखी और नौकरी कर रही हो, फिर पति की इतनी प्रताड़ना क्यों बर्दाश्त करती हो, इक्कीसवीं सदी की नारी हो कर क्यों ये सब झेलना हैं।पाखी कुछ बोल ना पाती। पति -पत्नी की लड़ाई में वो बच्चों से उनका पिता का प्यार छीनना नहीं चाहती। प्रसून पिछले एक साल से पाखी को नौकरी छोड़ देने के लिये विवश कर रहा था। पाखी उसे इतना समझाती पर जिसकी बुद्धि पर पर्दा पड़ गया हो वो कैसे समझेगा।


   आज पाखी की जरुरी मीटिंग चल रही थी। प्रसून पाखी को चाय बनाने के लिये कह रहा था। पाखी मीटिंग में होने की वजह से प्रसून की फरमाइश अनसुनी कर दी। जिसका बदला प्रसून ने पाखी का लैपटॉप तोड़ कर लिया। रमा जी भी बेटे को समझाने के बजाय हमेशा पाखी को हीं दोष देती। वे स्त्री होकर भी दूसरी स्त्री की व्यथा समझ नहीं पा रही थी। बच्चे अलग सहमें खड़े थे। बच्चों को बहला कर पाखी कमरे में लें आई। पर आज पानी सर से ऊपर चला गया। कोई ना कोई निर्णय लेना हीं पड़ेगा। जब भी पाखी कठोर बनने की कोशिश करती, प्रियम पाखी से पूछ लेता -माँ आप पापा को छोड़ दोगी।


पाखी सिहर जाती, बेटे का असुरक्षित स्वर सुन कर। एक स्त्री शायद कठोर हो निर्णय लें भी लेती, वही एक माँ, बच्चों को देख निर्णय नहीं लें पाती।सब कुछ सहने के लिये विवश हो जाती।उच्च पद पर कार्य करने वाली पाखी की स्थिति घर में नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं हैं।आखिर ये भेदभाव कब तक चलेगा। पाखी पति के समकक्ष कमाती हैं।स्त्री को सिर्फ पति की हीं बात माननी होंगी, दाम्पत्य जीवन में सिर्फ पति -पत्नी बराबर नहीं होते, बल्कि पति परमेश्वर होता।आखिर क्यों..?जब दोनों हीं गाड़ी के सामान पहिये हैं, जो बराबर भार वहन करते, फिर क्यों एक ऊपर और दूसरे का स्थान नीचा..। ये हम स्त्रियाँ खुद हीं निर्धारित कर देती।


 प्रसून और पाखी का दाम्पत्य जीवन तो देर -सवेरे पटरी पर आ हीं जायेगा,पर मन में लिखने के दौरान बहुत प्रश्न उभर गए।क्या इक्कीसवीं सदी की नारी आज भी विवश हैं, क्या पढ़ने -लिखने के बाद भी पति उसे सम्मान नहीं दे पाता हैं। इसका जिम्मेदार कौन हैं। समाज या माँ -बाप जो अपने बच्चों को सम्मान करना नहीं सिखाते हैं या असफलता को स्वीकार करना नहीं सिखाते हैं। क्या रमा जी जैसी सास का व्यवहार, बदलते समय में ठीक हैं।क्यों वो अपनी बहू के लिये खड़ी नहीं हो पाती। क्यों वो हमेशा बेटे के पक्ष में खड़ी हुई, एक स्त्री का पक्ष उन्हे क्यों नहीं दिखा।एक पत्नी को हमेशा चाहे वो उच्च वर्गीय हो या निम्न वर्गीय हो, क्यों प्रताड़ना झेलनी पडती। समानता के नारे के बावजूद क्या सच में नारी को सामान अधिकार मिला हैं।एक दिन नारी दिवस मनाने से क्या होगा जब तीन सौ चौसठ दिन वो प्रताड़ित होंगी।जब तक एक स्त्री दूसरी स्त्री का साथ नहीं देगी, हमारे समाज में कोई बदलाव नहीं आयेगा।



--संगीता त्रिपाठी

#Break The Bias 

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