सावन, आखिरकार बरस ही गया

सावन, आखिरकार बरस ही गया

समर और सुनंदा सहित बहुत से विद्यार्थियों ने एक प्रतिष्ठित संस्थान में इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा के माध्यम से दाखिला लिया। सुनंदा जहाँ एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से थी वहीं समर के पिताजी मंत्री थे और मम्मी रमा जी जानी मानी सोशलिस्ट। समर का खानदान पीड़ियों से रईसी देखता चला आ रहा था। नौकरों की बाढ़ लगी थी, उसके घर में। समर के पिताजी मंत्री जी का तो कहना था कि विदेश से मैनेजमेंट कर अपना फैमिली बिज़नेस जोकि माइनिंग का था वो समर संभाले परन्तु समर को इंजीनियरिंग कर जॉब करने का था तो मंत्रीजी ने जाने दिया सोचा कि इंजीनियरिंग कर अपने बिज़नेस को देख लेगा तब तक जॉब का भूत उतर जायेगा।

समर का एक बड़ा भाई मनोहर है जो उनका दूसरा बिज़नेस टेक्सटाइल का देखता है। मनोहर का विवाह रमा जी के फैमिली फ्रेंड और मशहूर चमड़ा उद्योगपति कीर्ति लाल की नकचढ़ी बेटी गार्गी से हुई जिसने शादी के दो साल में ही पति और टैक्सटाइल बिज़नेस को कब्जे में कर उसे घर से काट दिया।

सुनंदा का एक छोटा भाई है जो स्कूल में पड़ता है। सुनंदा के माता- पिता , रामकिशोर जी और सुधा जी दोनों इंटर कॉलेज में गणित और साइंस के टीचर हैं।

खैर जैसा होता है , एक ही ब्रांच इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में होने के कारण सुनंदा और समर की बातें हुई। जान-पहचान आगे बड़ी ,दोनों ही ९ सी जी पी ए वाले हैं। स्टडी करते-करते कब दिलों के तार जुड़ गए उन्हें पता ही नहीं चला।

चार साल का साथ काफी होता है , इंस्टिट्यूट से जाते वक्त दोनों ने एकदूसरे का साथ निभाने के वादे के साथ विदा ली। उस समय मोबाइल तो थे नहीं , लैंडलाइन का ही सहारा था।

सुनंदा अपने शहर आई पिताजी को एक महीने के अंदर ही हार्ट अटैक पड़ा जिसकी वजह से सुनंदा को अपने ही शहर में छोटी जॉब करनी पड़ी।

उधर समर को मंत्रीजी ने अमेरिका भेज दिया, मैनेजमेंट का कोर्स करने।

सुनंदा के पिताजी का देहांत एक साल के भीतर हो गया और उन्हें उस शहर से दुसरे शहर शिफ्ट करना पड़ा क्योंकि सुनंदा को थोड़ी ठीकठाक जॉब मिल गयी थी। माँ और भाई भी साथ चले गए , माँ ने वहां स्कूल में नौकरी शुरू कर दी। भाई का मेडिकल में सिलेक्शन हो गया। वो मेडिकल पढने पुणे चला गया।

इधर दो साल बाद समर सुनंदा के शहर आया तो उसे पता चला कि वो लोग शहर छोड़कर जा चुके हैं। समर ने उसे ढूंढने की कोशिश की पर नाकामयाब रहा।

समय गुजरता गया पर समर शादी के लिए राज़ी नहीं हुआ तो नहीं हुआ। मंत्रीजी गुजर गए, रमा जी कह-कह कर थक गयीं पर सुनंदा समर के मन की तहों में बसी थी और उसकी जगह वह किसी को नहीं दे सकता था।

आज की तारीख में समर पैंतीस साल का सफल माइनिंग बिजनेसमैन है। लोग आज भी उसके लिए रिश्तों की बाढ़ लेकर आते हैं। अब तो रमा जी ही मना कर देती हैं।

समर ने हाल में झारखण्ड में खदानें ऑक्शन में खरीदी हैं। साइट का काम पूरा हो चूका है , ऑफिसर्स और कर्मचारियों की कॉलोनी भी बन चुकी है। कॉलोनी में स्कूल, हॉस्पिटल , कम्युनिटी सेंटर , शॉपिंग काम्प्लेक्स, मल्टीप्लेक्स सहित सभी सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण कॉलोनी है।

हॉस्पिटल , स्कूल सभी में एम्प्लाइज अप्पोइंट हो चुके हैं बस हॉस्पिटल में रेडियोलाजिस्ट के लिए इंटरव्यू चल रहे हैं।

समर अपनी मम्मी रमा जी के साथ उन्हें इस माइनिंग साइट दिखने आया हुआ है। इंटरव्यू में समर और राम जी दोनों मौजूद हैं।

एक कैंडिडेट का नाम पढ़कर समर चौंका , सरनेम से किसी की याद आ गयी- सौरभ राम मिश्रा

कैंडिडेट अंदर आया बाकि प्रोफेशनल इंटरव्यू एक्सपर्ट मेडिकल प्रोफेशनल्स ने लिया , समर उसे ऑब्ज़र्व कर रहा था। समर ने उसके पर्सनल डिटेल पढ़ी - माता- पिता का नाम राम किशोर मिश्रा व सुधा मिश्रा , बहन- सुनंदा मिश्रा ....

समर ने सौरभ को अपाइंटमेंट के आर्डर पर साइन किये और सौरभ को अपने ऑफिस चैम्बर में मिलने बुलाया।

सौरभ के आते ही उसने पूछा, " सुनंदा मिश्रा, बी टेक इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग फलां इंस्टिट्यूट फलां वर्ष में?"

" जी सर। "

" अच्छा अब वह कहाँ हैं ? उनकी मैरिज कहाँ हुई है ? मेरा मतलब आजकल किस जगह हैं?" समर अपनी उतावली पर झेंप गया परन्तु वह संभल कर सब पूछ रहा था ताकि सौरभ को अजीब ना लगे।

"सर , वह अविवाहित हैं ,माँ और दीदी देहरादून रहते हैं , दीदी आजकल देहरादून में जॉब में हैं। "

फिर तो क्या था सौरभ को सभी कुछ बता कर, उसी दिन सौरभ के साथ अपनी मम्मी रमा जी को लेकर समर देहरादून पहुँच गया।

सौरभ ने बताया कि उसका जॉब माइनिंग साइट में लग गया है और किसी काम से वो अपने कंपनी के मालिक के साथ देहरादून आ रहा है।

दरवाज़े पर घंटी बजने के साथ सुनंदा ने लपककर खोला। समर को अचानक सामने देख सुनंदा के मुख से शब्द ही नहीं निकले।

फिर संभलकर नमस्कार करती हुई बोली," नमस्कार!, आप?आइये। " कहते हुए अंदर आने का रास्ता दिया। रमा जी की ओर देख सौरभ से पूछने वाली थी कि रमा जी बोल पड़ी," मैं समर की माँ !"

"नमस्ते आंटी " कहते हुए पैर छू लिए सुनंदा ने

अंदर आकर सुनंदा बोली,"आपकी वाइफ और बच्चे नहीं आये ?"

समर से पहले रमा जी बोल पड़ी," वहीँ तो लेने आए हैं। "

"जी ?....."

फिर रमा जी ने सुधा जी से बड़े कायदे से अपने बेटे समर के लिए सुनंदा का हाथ माँगा । एक हफ्ते में ही समर और सुनंदा की शादी बड़े धूमधाम से हो गयी और आज पिया मिलन की रात्रि आ गई ,सही अर्थों में आज अपने समर की हो गयी सुनंदा। इतने वर्षों से शुष्क मरुस्थल में सावन आखिरकार बरस ही गया।


-प्रियंका सक्सेना

(मौलिक व स्वरचित )

(श्रृंगार रस - रति)


#नवरसक्वीन

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