सावन में नवविवाहित जोड़े के अलग रहने के पीछे क्या है धारणा ?

सावन में नवविवाहित जोड़े के अलग रहने के पीछे क्या है धारणा ?

सखियों आज का जो विषय मैंने सुना है वह है कि सावन के महीने में विवाहित स्त्रियों को मायके में रहने का क्यों है प्रचलन ……. आखिर क्या है इसके पीछे की धारणा ???

दरअसल सावन महीने के सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए ही कई परम्पराएँ प्रचलित हैं वैसे तो अब समय के साथ काफी कुछ बदलता जा रहा है। 

सावन महीने को चंचलता से जोड़ा गया है । बुजुर्गों ने इस महीने में नवविवाहिता स्त्रियों को पति से दूर रखने के प्रयास से ही मायके में रहने की प्रथा चलाई , परंतु आज की युवा पीढ़ी इन सब रीति-रिवाजों को भूलती या पीछे छोड़ती जा रही है । आज बुजुर्गों की सोच पर युवा सोच भारी होती जा रही है। आज के युवा बच्चे इस रिवाज़ को निभाते तो जरूर है परंतु नवविवाहिता केवल एक-दो दिन के लिए ही मायके जाती है या यूँ कह दीजिए कि पतिदेव भी रिवाज़ निभाने के नाम पर केवल एक-दो दिन के लिए ही पत्नी को मायके भेजते हैं ।

यह भी कहा जाता है कि इस महीने सास-बहू को एक साथ नहीं रहना चाहिए परंतु आपको बता दें कि कुछ बहुएँ ऐसी भी हैं जो खुद पति से दूर होने के बजाय सास को ही उसके मायके भेज देती हैं।

वहीं इस महीने की परंपराओं के बारे में बताया जाता है कि शृंगार से जुड़े इस महीने के पहले दिन ही 'सुहागिनों का त्योहार' होता है । यह महीना भर चल रहा होता है । विवाहिता अपने ससुराल से जो फल व पकवान लाई होती हैं, उसे सभी सहेलियों संग मिल-बाँट कर खाती हैं । आपस में दिल की बातें साँझा करती हैं । इसके बाद  नवविवाहिता महीना भर मायके में ही रहती है । परंतु अब ऐसा नहीं है ।

कामकाजी औरतें तो बिल्कुल यह कहकर पल्ला झाड़ लेती हैं कि उनके पास इतना समय ही नहीं है कि वे ऐसी प्रथाएँ निभा सकें। पहले लोगों के पास बहुत खाली समय होता था जिससे कि वे कितने भी समय के लिए कहीं भी रुक जाते थे । परंतु आज तो  नवविवाहित इतने व्यस्त हैं कि उनका भी रोजाना मिलन नहीं हो पाता। 

बहुत से लोग सावन से जुड़ी परंपराओं को साइंस से जोड़ते हुए भी बताते हैं कि इन दिनों शरीर कमज़ोरर होता है। ऐसे में  सेक्स , व्यायाम , शरीर को थकाने वाला कोई भी काम नहीं करना चाहिए। इसलिए भी पति-पत्नी के दूर रहने की परंपरा चली आ रही है । 

इन दिनों इंफेक्शन होने का डर भी रहता है । सेवइयाँ और पकवान खाने से भी बरसात के मौसम में होने वाली बीमारियों से बचा जा सकता है । 

बाकी सब अपने-अपने घर-परिवारों की धारणाओं,रीति-रिवाजों पर आधारित है । कहा भी जाता है कि रिवाज़ तो हर गली-मोहल्ले में बदल जाते हैं । परंतु जो भी पुराने रीति-रिवाज़ चले आ रहे हैं , वे किसी ना किसी लोजिक पर आधारित हैं । सब के पीछे कोई ना कोई वैज्ञानिक तथ्य अवश्य ही छुपा है ।

मधु धीमान

पिंक कॉलमनिस्ट (हरियाणा)

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