दुआओं और मगफिरत की रात शब-ए-बरात

दुआओं और मगफिरत की रात शब-ए-बरात

विशाल संस्कृति वाले हमारे देश भारत में और विश्व भर मे इस बार रंगों के त्यौहार होली के साथ-साथ ही, मुसलिम समुदाय का एक अति महत्वपूर्ण त्यौहार 'शब-ए-बरात' भी मनाया जाएगा। 'इस्लामिक कैलेंडर' के अनुसार हर साल के आठवें महीने 'शहरे-शाबान' की चौदहवीं और पन्द्रहवी तारीख के दरमियान यह इबादतों को मुकम्मल करने वाला खास त्यौहार सभी मुस्लिम समुदायों के द्वारा बड़ी ही श्रद्धा से मनाया जाता है। 'शब-ए-बरात' को 'लयलतुन निस्फ' भी कहा जाता हैं।

'शब-ए-बरात' , जिसका शाब्दिक अर्थ होता है 'बरी होने की रात'। मुसलमान समुदाय के लिए इस रात का बहुत गहरा महत्व होता है। कुराने पाक में भी इस रात के ज़िक्र मे कहा गया है, कि ये रात एक तकदीर लिखी जाने वाली रात और अपने हर गुनाह से तौबा कर मगफिरत माँगने (माफी माँगने की)की रात है। 

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि चाहें हम कितनी भी कोशिशें कर लें, मगर इंसानी कालिब में हर इंसान से जाने-अनजाने में कई छोटे-बड़े गुनाह हो ही जाते हैं। मुसलिम समुदाय मे ऐसी मान्यता है कि हर साल 'शब-ए-बरात' की रात को इबादत कर अगर सच्चे दिल से अपने हर गुनाहों की माफी मांगी जाए तो पाक-परवरदिगार अपने सभी बन्दों के हर एक गुनाह को माफ कर दिया करते हैं।

इस त्यौहार को मनाने का मुख्य मकसद यही है कि ये गुनाह माफ करवाने की और उम्मीदें पूरी करवाने की रात है। मगर अलग-अलग मुस्लिम समुदायों में इस दिन को लेकर कुछ अलग अलग मान्यताएं और भी जुड़ी हुई है। कुछ मुसलिम वर्ग के लोग इस दिन कब्रिस्तानों में जाकर अपने बुज़ुर्गों के लिये चिराग रोशन करते हैं। मुसलिम समुदाय के एक वर्ग 'शिया' समुदाय के द्वारा यह भी माना जाता है कि, मगफिरत की रात होने के साथ-साथ यह दिन उनके समुदाय के 'इमाम मेहदी' के जन्मदिन का भी दिन है। उनके द्वारा इस दिन की दोहरी खुशियां मनाई जाती है।

इस दिन अलग-अलग मुस्लिम वर्ग के लोग अपने-अपने पूर्वजों की मान्यताओं के आधार पर उनके बताए अनुसार तरीकों से इबादत में मशगूल रहकर इस पर्व को बड़ी ही श्रद्धा से मनाते हैं। मोहल्लों और मस्जिदों में खूब रोशनी की जाती है। इस रात में सभी मुसलिम वर्गों द्वारा साथ मे मिलकर मस्जिदो मे नमाज़े अदा की जाती है, एक साथ मिलकर दुआएं मांगी जाती है और एक दूसरे को मिठाइयां बाँटकर इस पर्व की मुबारकबाद भी दी जाती है।

शब-ए-बरात के दिन हमारें यहाँ 'बोहरा-समुदाय' में एक खास किस्म का हलवा भी बनाने की परंपरा है। आटे-गुड़ और घी से बने हुए इस हलवे को जिस पारंपरिक विधि से बनाया जाता हैं, वो अत्यंत ही कठिन और बहुत सारा समय लेने वाली विधि हैं। इसमें गेहूं के आटे को अलग-अलग तरह की छलनियों में छानकर उनके बारीक कण बनाकर, घी,गुड़ और सूखे मेवों के साथ मिलाकर बहुत ही स्वादिष्ट हलवा तैयार किया जाता है। फिर इस हलवें का तबर्रुक अपने सभी दोस्तों-रिश्तेदारों के यहां पहुंचाया जाता है। 

हमारे पूर्वजों के द्वारा इस दिन बड़ी नमाज़ और कुराने पाक की तिलावत के बाद नबी सलल्लाहो अलयहे वसल्लम की सलवात पढ़कर खास दुआ की तिलावत करने का भी रिवाज है। ऐसा माना जाता है कि शब-ए-बरात की रात मे इस दुआ को पढ़ने के बाद 'बारगाह-ए-इलाही' मे हमारे हर गुनाह की माफी भी मिल जाती है और सच्चे दिल से जो भी दुआएँ मांगी जाती है, वो ज़रूर पूरी होती है।

दोस्तों एक ही दिन पर होली और 'शब-ए-बरात' इन दोनों त्यौहारों का आना एक बहुत ही सुंदर संयोग हैं। चाहे दुआएँ माँगने और इबादत में मशगूल रहकर अपने गुनाहों से मगफिरत करवाने की रात 'शब-ए-बरात' का त्यौहार हो या बुराई के जलकर राख होने का प्रतीक, रंगों और खुशियों का त्योहार होली हो, हमारे ये सभी त्यौहार हमारी संस्कृति की अनमोल धरोहर होने के साथ ही इंसानियत और सौहार्द का पाठ पढ़ाने वाले और भाईचारा बढ़ाने वाले सशक्त माध्यम भी हैं। 

अतः मेरा ये मानना हैं कि, किसी भी असहिष्णु धार्मिक या मतलबपरस्त राजनीतिक विचारों से प्रेरित होकर हम सभी को कभी भी अपने आपसी सौहार्द को खत्म नहीं करना चाहिए। ये हम सभी का फर्ज है कि साथ मिलकर एक दूसरे के त्योहारों और संस्कृति के प्रति सहिष्णु होकर सिर्फ प्यार और खुशियां बांटे। आखिर वास्तव में, यही तो हमारे सभी त्योहारों का असली उद्देश्य होता है, एक-दूसरे के संग प्यार और खुशियां बांटना।

धन्यवाद।
आपकी दोस्त,
सकीना साबुनवाला✍।

pic credit: साभार : जनसत्ता

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