शक्ति रूपेण संस्थिता!

शक्ति रूपेण संस्थिता!

हमारी भारतीय संस्कृति प्राचीन काल से ही स्त्रियों को शक्ति का प्रतीक मानकर उन्हें पूजती आई है। कोई भी देवी-देवताओं से संबंधित पौराणिक कथा उठाकर देख लीजिए सभी में आदिशक्ति का गुणगान है। प्रत्येक वर्ष नवरात्रि का तो हमारे जीवन में आगमन ही होता है स्त्री शक्ति को पहचान कर उसमें समाहित नव दुर्गा के नव रसों को अपने व्यक्तित्व में उतारकर समय-समय पर आत्म मूल्यांकन करने के लिए, शारदीय नवरात्र उनकी उपासना से स्वयं को शुद्ध करके बदलने का अवसर देता है हर स्त्री में एक दुर्गा है इसलिए हमें भी देवी की तरह विभिन्न रूप धरकर अनेकों अनेक भूमिकाएं निभानी है। देवी दुर्गा सभी प्राणियों की शक्ति भी हैं और परिवर्तन करने के लिए प्रेरणा स्त्रोत भी।

उत्सव के रंग शीर्षक के अंतर्गत जब स्त्री के अनेक रूपों पर ब्लॉग लिखने का विचार मन में आया तो सबसे पहले सोचा कि क्यों न स्वयं से ही आरंभ किया जाए।

आज नवरात्रि का पहले दिन सुबह जागी तो ऐसा लगा मानो मेरा नया जन्म हुआ हो, प्रतिदिन आने वाला विहान आज कुछ अलग ही लग रहा था, मन उत्साह से भरा था। प्रतिवर्ष आने वाली नवरात्रि आज कुछ खास लग रही थी। आप सब भी उत्सुक होंगे कि आखिर आज ऐसा क्या खास है?

आज मेरा कई वर्षों से अधूरा सपना पूरा होने जा रहा है और वह है अपने अस्तित्व की तलाश।

आज से 25 वर्ष पहले जब विवाह हुआ और अपना घर छोड़कर दूसरे शहर में आई तो ससुराल का माहौल अपने स्वभाव से मेल न खाता देखकर पता नहीं क्यों सारे सपने उम्मीद  सभी छोड़कर केवल घर  गृहस्थी में ही मन लगा लिया। लेकिन मन के एक कोने में अपने अस्तित्व को तलाशने का द्वंद जारी रहा।

आखिर विवाह के 18 वर्षों के पश्चात मुझे घर से बाहर निकलने का अवसर मिला लेकिन एक भय हमेशा लगा रहता ,क्या मैं घर और बाहर की दुनिया में सामंजस्य बिठा पाऊंगी या हंसी का पात्र तो नहीं बन जाऊंगी।परंतु इन 5 वर्षों में मैंने बहुत कुछ सीखा और आगे भी सीखने की ललक बरकरार है।एक बेटी, पत्नी ,मां और अब कामकाजी स्त्री ,इन सभी भूमिकाओं के बाद अब लेखन कार्य में हाथ आजमाना चाहती हूं, अपनी भावनाओं को कागज पर उकेरना चाहती हूं।

आज तो केवल आगाज है अपने अस्तित्व को तलाशने  के लिए उठाया गया मेरा यह पहला कदम।

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