शॉपिग करो पर फिजूलखर्ची नही - Story Written by Himani Bisht

शॉपिग करो पर फिजूलखर्ची नही  - Story Written by Himani Bisht


शापिंग एक ऐसा नशा जिसको हर कोई जीना चाहता है फिर चाहे वह सपना हो या हकीकत में ...हंसिएगा मत वास्तव में सही बात है ना?


ऐसी ही सुलोचना जो शॉपिंग के नाम पर उछल जाती हैं।कभी पति, कभी बच्चों के लिए ना जाने कितने प्रकार के सामानों को खरीद कर लाना शौक सा बन गया था।


उसके पति और बच्चे परेशान हो चुके थे क्योंकि अनावश्यक वस्तुओं का उसके पास भंडार हो गया था।

जहां पर पैसे की बर्बादी तो थी ही साथ ही सामान की बर्बादी जिसका कभी भी कोई प्रयोग नहीं हो पाता था।इस शॉपिंग के शौक से पतिदेव भी परेशान हो चुके थे वह मानते थे कि जितना फालतू पैसा इन फालतू वस्तुओं के लिए प्रयोग किया जा रहा हैं उतना ही पैसा हम किसी जरूरतमंद को दे तो कितना बेहतर हैं।पर सुलोचना कहां सुनने वाली थी वह तो फिजूलखर्ची पर रोक नहीं लगा पा रही थी।


यह तो एक नशा था और यह नशा उतरना भी जरूरी था। एक दिन अपने शॉपिंग की आदत अनुसार वह दुकान में साड़ी लेने गई तो उसके सामने दो ऐसे वाक्ये हुए जिससे उसकी आंखें ही ना खुली बल्कि सोचने पर भी मजबूर हो गई कि पैसों की फिजूलखर्ची जगह पर जहां सदुपयोग करें।


जैसे ही वह साड़ी खरीदने लगी सामने से एक महिला आई। मालिक ने देखते ही अपने नौकर से ना जाने कान में क्या बोला।जब उस महिला ने एक साड़ी का दाम पूछा तो बहुत भौचक्की रह गई ।


अरे यह क्य ?जिस साड़ी का दाम उन्होंने मुझे इतना कम बताया था उसी साड़ी को उन्होंने दुगने दाम पर उस महिला के सामने प्रस्तुत किया।

मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि यह सब क्या हो रहा है।और वह महिला थोड़ा सा मोलभाव करने के बाद उस साड़ी की औसत मूल्य से भी ज्यादा मे ले गई।


उसी दुकान में उसी वक्त दूसरा वाक्या सुलोचना ने देखा कि एक महिला अपनी बेटी के साथ शादी का लहंगा लेने के लिए आई हुई थी।दिखने में बहुत बहुत ही साधरण थीं पर उसकी आंखों में ऐसी चमक थी मानो वह अपनी बेटी की शादी में सारे जहां की खुशियां और दौलत लुटा दे।महिला ने उस प्यारे से लहंगे के दाम पूछे तो उसके चेहरे पर एक उदासी सी छा गई।


उस लहंगे को छोड़कर जाने के लिए अपनी बेटी से बोलने लगी।पर उसी समय दुकान के मालिक ने फिर से अपने नौकर के कान में कुछ बोला और भागता हुआ नौकर आया।

बोला "सुनिए बहन जी इस लहंगे में डिस्काउंट है और यह आप जितने का बोल रही है ना उतने में आपको मिल जायेगा।


"जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद"... खुशी से झूमती हुई वह महिला अपनी बेटी के साथ उस लहंगे को पैक करके घर चली गई।


यह सब देखने के बाद सुलोचना के मन में एक सवाल पैदा होने लगा कि आखिर यह सब चल क्या रहा है।दुकानदार के पास जाकर उसने सारी बातें पूछी।


दुकान का मालिक बोला ..."बहन जी आप इस दुकान में रेगुलर आते हो इसलिए मैं आपको यह बात बता रहा हूं जो यह पहली महिला आई थी वह हर चीज वास्तविक मूल्य से भी नीचे का मूल्य लगाते हैं जो देना हमारे बस की बात नहीं है ।ऐसा नहीं है कि यह सक्षम नहीं है पैसा देने में पर इनकी एक आदत बन चुकी है इसलिए हम पहले से ही उसका उचित मूल्य जो है उसको दुगना कर देते हैं और वह महिला बार्गंरिंग करते-करते वह अपने उचित मूल्य पर आ जाती है।हम अगर ऐसा नहीं करेंगे तो हमारी रोजी-रोटी पर भी तो फर्क पड़ेगा।हैं ना...."

"वही दूसरी महिला की बात वह महिला वास्तविक रुप से बहुत ही साधारण थी लेकिन उनके मन में अपनी बेटी के सपनों को पूरा करने की जदोजहद थीं, वह साफ दिखाई दे रही थी और उनकी आंखों में ईमानदारी भी झलक रही थी।अगर मैं उन्हें आज उस लहंगे को नहीं देता तो उसकी उनकी बेटी का दिल टूट जाता और मैं नहीं चाहता था कि कि उस बच्ची का दिल टूटे इसलिए मैंने उस लहंगे को सबसे कम दाम में देने को तैयार हो गया क्योंकि कभी-कभी हमें दूसरों की खुशी को भी ध्यान देना चाहिए।बस यही इतनी सी बात थी"


यह सब सुनकर सुलोचना के मन में भी आया कि वह वास्तव में कितना फिजूल खर्च करती है अगर वह किसी की मदद नहीं कर सकती है तो फिजूलखर्ची करना भी उसकी आदत नहीं होनी चाहिए।


इस झटके से सुलोचना को तो सबक मिल ही गया ।साथ ही उसने अपनी हैसियत के अनुसार लोगों की मदद करना भी शुरू कर दिया।

हां गर वाले अब उस पर गर्व महसूस करने लगे।


तो दोस्तों शॉपिंग करना कोई बुरी बात नहीं लेकिन वस्तु का भंडार करना शायद सभी के लिए गलत है।हम अपने आसपास के लोगों को देखे जिन्हें वास्तव में चीजों की जरूरत है तो क्यों ना हम मदद ही कर दे ज्यादा ना सही कम ही सही।



कैसी लगी रचना बतलाइये।

आपकी दोस्त

हिमानी बिष्ट (मौलिक स्वरचित)

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