शिवलिंग पर जलाभिषेक करने के धार्मिक और वैज्ञानिक कारण

शिवलिंग पर जलाभिषेक करने के धार्मिक और वैज्ञानिक कारण

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्त जल और बेलपत्र से शिव जी का अभिषेक करते हैं। इसके पीछे एक बड़ा कारण है जिसका उल्लेख पुराणों में किया गया है।

इस बार महाशिवरात्रि का पर्व 1 मार्च, मंगलवार के दिन मनाया जाएगा।

आप जब ही मंदिर में जाते है तो देखते होंगे की कुछ ऐसा इंतजाम किया जाता है की शिवलिंग पर जल की बुँदे लगातार गिरती रहे और शिवलिंग जल से सदा तर रहे, क्या आप जानते है की शिवलिंग को जल से नहलाने का क्या कारण है! आज हम आपको इसके धार्मिक , एवं वैज्ञानिक कारण बताएँगे!


धार्मिक कारण -

शिव पुराण में उल्लेख मिलता है कि सागर मंथन के समय जब हालाहल नाम का विष निकलने लग तब विष के प्रभाव से सभी देवता एवं जीव-जंतु व्याकुल होने लगे। ऐसे समय में भगवान शिव ने विष को अपनी अंजुली में लेकर पी लिया।

विष के प्रभाव से स्वयं को बचाने के लिए शिव जी ने इसे अपनी कंठ में रख लिया इससे शिव जी का कंठ नीला पड़ गया और शिव जी नीलकंठ कहलाने लगे। लेकिन विष के प्रभाव से शिव जी का मस्तिष्क गर्म हो गया। ऐसे समय में देवताओं ने शिव जी के मस्तिष्क पर जल उड़लेना शुरू किया जिससे मस्तिष्क की गर्मी कम हुई।

बेल के पत्तों की तासीर भी ठंढ़ी होती है इसलिए शिव जी को बेलपत्र भी चढ़ाया गया। 


वैज्ञानिक कारण-

वैज्ञानिकों का मानना है कि शिवलिंग एक विशेष प्रकार का पत्थर होता है जिसे क्षरण से बचाने हेतु इस पर दूध, घी, शहद आदि जैसे चिकनी और ठंडे पदार्थ अर्पित किए जाते हैं।

अगर इस पर किसी प्रकार की तैलीय सामग्री अर्पित नहीं की जाती तो समय के साथ में भंगूर होकर टूट सकता है। परंतु यदि हमेशा इसे गिला रखा जाए तो यह हजारों वर्ष तक ऐसे ही बना रहता है। इसके अलावा वैज्ञानिक कहते हैं कि सभी ज्योत्रिलिंगों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है। एक शिवलिंग एक न्यूक्लिअर रिएक्टर्स की तरह रेडियो एक्‍टिव एनर्जी से भरा होता है।

यही वजह है कि इस प्रलंयकारी ऊर्जा को शांत रखने के लिए ही शिवलिंगों पर लगातार जल चढ़ाया जाता है। यह भी कहा जाता है कि तांबे के कलश से निकला जल शिवलिंग से मिलकर औषधि के रूप में भी कारगर होता है। 

जलाधारी को लेकर भी शास्‍त्रों में नियम दिए गए हैं. इसके अनुसार कभी भी जलाधारी को लांघना नहीं चाहिए क्योकिं शिवलिंगों के आसपास के क्षेत्रों में रेडिएशन पाया जाता है. इसके साथ ही शिवलिंग के आकार और एटॉमिक रिएक्टर सेंटर के आकार में काफी समानता है. ऐसे में शिवलिंग पर चढ़े जल में इतनी ज्यादा ऊर्जा समाहित हो जाती है कि इसे लांघने से व्यक्ति को नुकसान हो सकता है।

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