सुकुन

सुकुन

सर्दियों की सुबह, कड़कडा़ती ठंड रजाई की गरमाहट छोड़ निकलने का मन नहीं था लेकिन सुबह सुबह मम्मी पापा की चिक चिक ने जगा दिया |समय देखा तो 6.30 बजे 7.30 पर बस पकड़नी थी स्कूल के लिए स्टॉपेज पर (शादी से पहले मैं टीचिंग करती थी) |फटाफट उठी तैयार होकर कमरे में आई तो मम्मी से हंसते हुये पूछा ," क्या बात है इतनी ठंड में कैसे गर्म हो रही हो माता जी ?

परसों जो नई लोई (शॉल) लेकर आये थे हम इनके लिए कल रात को न जाने किसे दान कर आये |पूछा तो कह रहे हैं बाहर एक गरीब आदमी ठंड में सिकुड़ रहा था तो उसे दे आये |4 दिन पहले भी एक लोई दे आये थे किसी को |अब सुबह सुबह कह रहे हैं कि बक्से में से लोई ढूँढ दूं कोई पडी़ हो तो मन्दिर जाना है इन्हें |अब तु बता तुम लोगों के लिए लंच बनाऊं या इनकी लोई ढूँढूं |"

पापा खडे़ खडे़ मुस्करा रहे थे और मम्मी बक्सा खोलते खोलते बड़बडा़ये जा रही थीं |मैं शूज पहनते इन दोनों की प्यारी नोंक झोंक देख हंसे जा रही थी |खैर मम्मी को एक लोई मिल गई और पापा उसे कंधे पर डालकर मन्दिर निकल गये |

कुछ देर बाद लंच बॉक्स उठा मैं भी भागी स्टॉपेज की तरफ |7.20 पर भी अंधेरा सा था आज बच्चों की तो छुट्टी थी मगर टीचर्स को बुलाया था |मैं स्टॉपेज पर खडी़ बस का इन्तजार कर ही रही थी कि रोड के किनारे एक बूढी़ औरत को बैठे देखा जिसके वदन पर एक हल्का सा स्वेटर था और ठंड में उसकी दरदरी छूट रही थी |देखकर मन बहुत विचलित हो गया |

वैसे भी वृन्दावन में ऐसे दृश्य अक्सर देखने को मिल ही जाते थे |आज बस लेट थी मैं इन्तजार में खडी़ थी और बार बार नजरें उसी बूढी़ महिला पर जा रही थी |मैं सोचने लगी मैं इनर, कुर्ती, जैकेट , स्टॉल शूज शॉक्स और ग्लोवस में भी ठंड महसूस कर रही हूं तो इस बेचारी का न जाने क्या हाल होगा |मेरी नजर उस बुजुर्ग महिला से मिली तो लगा कुछ कहना चाह रही हो |उसकी उदास निगाहें न जाने क्या असर कर गईं मैं अपना स्टोल और ग्लोवस उसे देकर बोली, "अम्मा आप ये ओढ़ लो ठंड बहुत हैं अभी मुझे स्कूल जाना है शाम को मैं आपको और गर्म कपडे़ दे जाऊंगी |"
मेरी बात सुनकर वह मुस्करा दी और सर पर हाथ फेरने लगी |मन को बहुत अच्छा लगा |

"बेटा कुछ खाने को और दे देती " अम्मा बोली 

मेरी बस आ गई  थी |पैसे ढूढंने में समय लगता इसलिए अपना लंच बॉक्स देकर मैं बस में बैठ गई |स्कूल में अपनी दोस्त के साथ लंच शेयर कर लिया था |दोपहर बाद घर लौटी तो मम्मी बाजार जा रही थी घर का कुछ सामान लेने , मैंने कहा, " मम्मी एक ब्लैक स्टॉल ले आना प्लेन ( सर्दियों की यूनिफार्म में था ) "

"तेरा स्टॉल कहां गया"  मम्मी आश्चर्यजनक भाव से कहने लगी |

"अरे वो एक अम्मा को दे दिया, बहुत ठंड थी ना बेचारी सिकुड़ रही थी |"

"ऐसा करो दोनों बाप बेटी एक धर्मशाला खोल लो और वृन्दावन में जितने गरीब लोग हैं सबको उसमें रख लो |पुरखों की दौलत तो है ही खर्च करने के लिए |" मम्मी कहते हुये बाजार चली गई और मैं पुराने कपडे़ छांटने |

वैसे तो मेरी मम्मी भी कम दयालु नहीं है किसी का दुख दर्द नहीं देख पाती लेकिन मेरे और पापा की चीजें दे आने की वजह से उन्हें जो असुविधा होती थी उससे चिड़चिड़ा जाती थी |आज मैं पूरा घर संभाल रही हूं उस समय तो मम्मी ही सारा काम करती थी |इतनी समझ ही नहीं थी कि मां को भी चाहिए थोडा़ आराम |

खैर शाम को मेरा स्टॉल भी आ गया और अम्मा को पुराने गर्म कपडे़ भी दे आई |सच में बहुत सुकुन मिला मन को और वह दिन बन गया एक यादगार दिन | ऐसे किस्से तो और भी बहुत हैं बताती हूं किसी और दिन |

-सीमा शर्मा "सृजिता "

What's Your Reaction?

like
0
dislike
0
love
0
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0