सुकूँ के दो पल सपने में नहीं हकीकत में

सुकूँ के दो पल सपने में नहीं हकीकत में

आज सुबह से सावित्री जी का मूड ऑफ हो चुका था।कोई मनाने वाला भी तो नहीं था।बिटिया को फोन नहीं कर सकती थी क्योंकि वो  गर्म मिज़ाज़ की है कहीं गुस्से में भाई को फोन करके उल्टा सीधा न सुना दे।इतनी सुलझी महिला हैं सावित्री देवी।चलिये उनके परिचय के साथ ही उनके मूड ऑफ होने का कारण भी आप लोगो को बताती हूँ।

सावित्री जी सेवानिवृत अध्यापिका है।पति का बहुत पहले ही देहांत हो चुका है।उनका बड़ा बेटा इंजीनियर है और छोटी बेटी भी अध्यापिका है।दोनों बच्चों का विवाह हो चुका है।आजकल वे बेटे के पास आयी हुई थीं।पिछले वर्ष ही वे सेवानिवृत हुई थीं।उनकी बड़ी इच्छा थी कि वे अपना छोटा सा घर बनायें परन्तु बेटे ने दिल्ली में ही फ्लैट ले रखा था।

इसलिए बच्चों ने उनसे से कहा कि -"अब घर क्यों बनाना और वैसे भी इतनी दूर नैनीताल में आकर अब हम क्या करेंगे..जब जॉब दिल्ली में ही है"..सावित्री जी आज तक किराए के छोटे से घर में रहती थीं ।बच्चों की पढ़ाई-लिखाई फिर शादी में होने वाले खर्चो के कारण खुद के घर बनाने की इच्छा दबाते चलीं आयीं।

खैर अभी  वो नैनीताल के किराए वाले घर को ताला लगा छः महीने से दिल्ली रह रहीं थीं।परन्तु कभी -कभी बहु कुछ ऐसा बोल देती कि सीधा दिल मे शूल की तरह चुभता।हालांकि बहु बुरी नहीं थीं पर हमेशा ये भान कराती कि ये घर उसका है।अभी पिछले हफ्ते ही वो मंदिर के लिये भगवान की कुछ मूर्तिया खरीद के लायीं तो वो बोल उठी -"मम्मी इतनी मूर्तियों को कहाँ रखेंगी.. मंदिर में आर्किटेक्ट ने  गणेश की मूर्ति स्थापित तो करी ही है,अब और  इतनी मूर्तियां ! आर्किटेक्ट ने भी कुछ सोच के इतना खूबसूरत घर बनवाया होगा ना...आप भी बस ना"।

और मन मसोजकर उन्होंने वे मूर्तियां सम्भाल कर रख दी।।हालांकि बहु कुछ देर में चाय बना के ले ही आती..मुँह से कहती कुछ नहीं थी पर सावित्री जी की पारखी नज़र बहु की नजरें पढ़ ही लेती कि उसे मन मे अपने द्वारा कहे वचनों का पश्चाताप  है।पर आज सुबह किचन में चाय का गिलास उनके हाथ से गिरा ही था और वो पोछा लिये साफ कर हैं रहीं थी कि बहु आ गयी -"क्या हुआ मम्मी जी..चलिये छोड़िये मैं लगा देती हूँ पोछा आप फिर कुछ और गड़बड़ कर देंगी..अरे ये क्या गड़बड़ कर ही दी ना आपने.. ये पोछा ज़मीन वाला नहीं था..सेल्फ वाला पोछा था...आप भी न मम्मी जी "।सावित्री जी भरे मन से बाहर आ गयीं।

तभी काम वाली भी आ गयी और सावित्री जी बाहर बालकनी में बैठ गयीं क्योंकि पोछा सूखने तक भीतर कमरों में आने की मनाही थी।सावित्री चाहती तो बहु को जवाब देती पर वो बात का बतंगड़ नहीं बनाना चाहती थीं वो पढ़ी लिखी समझदार अध्यापिका थीं छोटी -छोटी बातों को इग्नोर कर देती थी।बाहर बैठे- बैठे उनकी आँख लग गयी।तभी बहु बोली -"मम्मी जी उठिए ना..बाहर बहुत गर्मी है चलिये..पोछा तो कब का सूख गया... अंदर ऐसी में बैठिये..मैं खाना लगाती हूँ"।
सावित्री जी भी भूल के बहु सँग खाना खाने बैठ गयी।

"बहु आज रात का खाना थोड़ा पहाड़ी स्टाइल का मैं बना दुंगी ..बहुत दिनों से वो खाना खाया नहीं है"..
"अरे मम्मी जी कोई भी पसन्द नहीं करता इस घर मे पहाड़ी खाना..आप रहने दो मैंने सुबह ही प्लान कर लिया था कि क्या खाना बनना है..खाली किचन भी छोटा सा है..कुछ गड़बड़ कर देंगी आप"..सावित्री जी यहाँ रहते हुए मन ही मन घुटने लगीं थीं।किसी से परेशानी शेयर भी नहीं कर सकती थीं..उनका भी एक सपना था सेवानिवृति के बाद चैन और सुकून के साथ अपने बनाये छोटे से घर मे रहने का।जिसके छोटे से आँगन के कोने में छोटा सा तुलसी का पौधा हो।उनका अपना प्यारा से कमरा हो जिसमें एक तरह बुकसेल्फ़ हो क्योंकि उन्हें पढ़ने का बेहद शौक था।बेडरूम में एक खिड़की हो जहाँ एक छोटा सा मनीप्लांट का पौधा हो।घर मे बैठक का कमरा अलग हो।यहाँ तो वो बैठक में ही सोती थीं।मेहमानों के लिये भी कमरा हो।जिसमें एक टेबल कुर्सी के साथ डबलबेड लगा हो।मंदिर का कमरा इतना बड़ा हो कि कम से कम दस बारह लोग कीर्तन भजन कर सकें।एक छोटा सा बेंत का झूला हो जिसमें उनके नाती -नतिनी झूलें।अकसर अपने स्कूल(नौकरी) के दिनों में वो इस तरह के मकान का नक्शा अपनी डायरी में बनाती रहती साथी अध्यापिका शांता कहती-" सावित्री कितना शौक है तुम्हें अपने घर का"..

तब वो कहती -"जी दी हमेशा दो कमरों के किराए के मकान में रहीं..उस पर भी ज़िन्दगी नौकरी के पीछे भागती रही कभी सुकून से घर क्या होता है ये सोचा ही नहीं..भागमभाग में पूजा पाठ भी दीवार पर टँगे छोटे से मंदिर में ही किया..सच में दी घर बनाने का बेहद शौक है मुझे..पर बेटा-बहु का कहना है कि हमने फ्लैट ले लिया है ..कहाँ घर बनाने का चक्कर पाली हो आप दिल्ली आ जाओ".."पर सावित्री तुम खुद आत्मनिर्भर हो ...एक्टिव भी हो..क्या आम सासों की तरह ज़िन्दगी जी पाओगी.. हमेशा तुम बच्चों से कहती हो..जो सपना देखा है वो पूरा करो..तो आज अपना सपना क्यों नहीं ??" रहरहकर सावित्री आज शान्ता दी को याद कर रही थी।"चलो फोन करती हूँ आज"...ये सोच कर फोन लगाया।

"हेलो दी प्रणाम..कैसी हैं आप?""बढिया  तुम सुनाओ कैसी चल रही महानगरों की ज़िंदगी..ऊँचे फ्लैट्स से कैसे लगता है नीचे देखना..तुम्हारा वो तुलसी का गमला,मनीप्लांट का पौधा,भजन- कीर्तन सब जैसा सोचा था वैसा ही है क्या"।

"अरे नहीं दी ..छोटा बच्चा है घर पर..उसके ही कपड़े बहुत हो जाते हैं..छोटी सी दो बॉलकोनी है उसमें कहाँ ये सब..हाँ बच्चे के साथ दिन कब निकल जाता है पता ही नहीं लगता।और दी हम पहाड़ वालो को तो ऊंचाई से नदी नाले,खेत खलिहान,जंगल देखना अच्छा लगने वाला हुआ..यहाँ नीचे कीड़े मकोड़ों सी चलती गाडियाँ.. लेकिन सब साथ है ये अच्छा है"..

"अरे ऐसा है तो आ जाओ ..सपना पूरा करने..कुछ बिल्डर्स ने यहां पर भी छोटे छोटे मकान बनाने शुरू कर दिए है..जाड़ो में महानगर में रहना और गर्मियों में पहाड़..और चीज भी जुड़ जायेगी तुम्हारी..कल का दिन बच्चों के ही काम आ जायेगी"।ये सुनकर सावित्री की आँखों मे चमक आ गयी।

बहुत ही खुश हो गयी वो।शाम को बेटे से उन्होंने ये बात शेयर की।-"मम्मी वैसे मुझे पता है आपके सपने के बारे में अकसर आपकी डायरी को चुपके से देख लेता था..बचपना हमारा नैनीताल में बीता है ..अपनी जड़ों से जुड़ना किसे अच्छा नहीं लगता..पर मम्मी मेरी नौकरी और परिवार अब वापस नहीं आ सकते ..सभी सपने पूरे हो ये सम्भव नहीं हो सकता"।

"बेटा तुम्हारा कहना सही है..मुझे अकेले रहने की आदत है..और इतनी बूढ़ी नहीं हूँ मैं अभी (हँसते हुए बोली)..एक नयी चीज जुड़ जाएगी जिसे तुम दोनों भाई बहन मेरी निशानी समझ रख लेना।बच्चे कल बड़े होने लगेंगे और उन्हें पहाड़ घुमाने के बहाने उस घर में लाना।और मैं भी ठंड बढ़ने पर यहाँ आ जाऊँगी।

और ठीक दो माह बाद 'सावित्री कुटीर'में गृह प्रवेश का उत्सव था।तुलसी का पौधा, मनीप्लांट और झूला सभी अपनी जगह थे..बॉलकोनी में चाय पीते सामने पहाड़ो को निहारती सावित्री जी सुकून के दो पल सपने में नहीं हक़ीकत में जी रही थीं।
तो दोस्तों कैसी लगी आज की कहानी।

आपकी स्नेह
सर्वाधिकार सुरक्षित।

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