सुरंभा

सुरंभा

चुलबुली स्मिता अपने ससुराल पहुंची, आलोक से अरेंज मैरेज हुई थी ना कभी मिली ना कभी जाना, देखने मे आलोक बहुत धीर गम्भीर शांत थे, आलोक को पहली बार देख कर ही वो सहम गई थी पूरी शादी के दरम्यान, कैसे उससे निभाएंगी, कैसे उसे प्यार कर पाएगी इस उधेड़ बुन मे पूरी शादी बीती।

एक तो माँ पापा भाई बहन और अपने प्यारे से घर को छोड़ने का दर्द उसके साथ ससुराल के लोगों के साथ निभाने का दायित्व, और सबसे बड़ी उलझन कैसे एक अनजाने और अनदेखे इंसान को जीवन साथी के रूप मे अपने दिल मे जगह देगी!

बहुत सारी उलझनों और जीवन के नव पथ पर अग्रसर होने के दायित्व को लेकर ससुराल पहुंचीं स्मिता, ससुराल मे नववधू को यथोचित स्वागत और सत्कार मिला, पूरा घर नाते रिश्तेदारों से भरा था, सभी औरते स्मिता को घेर कर बैठी थी, मुँह दिखाई की रस्म हुई सभी ने दुल्हन की सुंदरता की खूब तारीफ़ की,।

स्मिता का दिन तो नाते रिश्तेदार की भीड़ के बीच दिन गुजरा, इतनी भीड़ मे अपनों के बिना अकेली सी थी, बार बार माँ पापा को याद कर आँखों से आँसू बह पड़ते किसी तरह अपने आप को संभालती।

शाम हुई तो सब उसे उसके कमरे में ले गए पूरा कमरा फूलों से सजा था सभी उसके साथ ही थे लेकिन आलोक नहीं, आलोक आते और कमरे से कुछ लेकर चले जाते एक पल भी नहीं ठहरते थे|  स्मिता को लगता जैसे आलोक बहुत रूखे व्यवहार के हैं जिसका  हाथ थाम यहां अनजानों कर बीच आई थी!" उसका व्यवहार ऐसा है ये सोच स्मिता घबरा उठी, कैसे निभाएगी उससे ये रिश्ता!

जाने कितनी कहानियाँ सुन रखी थी सहेलियों से इस प्रथम मिलन की बेला के बारे में, लेकिन इस अनजाने पिया के साथ कैसे निभाएगी वो प्यार की इस रस्म को वो भी इस रूखे इंसान के साथ!

कुछ देर बाद सभी कमरे से चले गए, कमरें मे अकेली बैठी थी , सिमटी हुई सी , आलोक के कमरे में आते ही वह भय से सिहर उठी, उसके हाथ पसीने से गिले हो गए, उसके होंठों मे एक कंपन सी उठी और कपोल रक्त जवा पुष्प से लाल हो गए,।

आलोक ने एक नजर स्मिता को देखा जैसे उसके मन को पढ़ लिया उसकी घबराहट को महसूस कर लिया था,और बहुत समान्य ढंग की बाते करने लगे.. कोई औपचारिकता नहीं बस इधर उधर की बाते..।

तुम्हारे घर वो कौन थी? शादी मे उस वक़्त जो दिखे थे वो कौन थे,? इस तरह की जाने कितनी फालतू सी बातेँ जिनका जबाव देते देते कब स्मिता का डर छू मन्तर हो गया उसे पता ही नहीं चला।

पूरी रात वह उससे बातें करते रहें और ना जाने कब स्मिता का भय आलोक के प्रति प्यार मे बदल गया और उसी रात एक नए रिश्ते का जन्म हुआ।

बातेँ करते करते आलोक सो गए और स्मिता यूँ ही बैठी सोते आलोक को निहार रही थी, आलोक की पलकें मूँदी हुई थी और स्मिता उन्हें अपलक निहार रही थी, उन आँखों से उस चेहरे से प्यार हो गया था उसे।

आज स्मिता का अपना अस्तित्व जैसे डूबता महसूस हो रहा था इस प्यार के समन्दर मे, कभी नहीं सोचा था एक रात के कुछ पल मे वो एक इंसान के लिए उसकी पत्नी ही नहीं प्रेमिका बन जाएगी।

आज जाने कौन सा जादू चला कि एक अनजाना सा शख्स जिसे कुछ पल पहले ही तो जान पाई और उससे ही प्यार कर बैठी, शायद ये उस गठबंधन का ही असर था जो ईश्वर को साक्षी मानकर, बड़े बुजुर्गों के आशिर्वाद के छांव मे, रोरी, सिंदूर, हल्दी, अक्षत,  मंगलसूत्र, कलश और जाने कितने शुभ मंगल की चीजों, के साथ जोड़ा गया था।

ये कैसा बंधन है सोच कर उसकी आँखो मे एक शोखी सी तैर गई..स्मिता ये सोच वो खुश थी कि एक पत्नी के सारे रूप मे से एक रूप जो प्रेमिका का होता है जो वेदों मे लिखा है उसने उस रूप का वरण कर लिया था।

दोस्तों, मेरी नई कहानी .........उम्मीद है कि आप सभी को पसंद आएगी |

Archana K.Shankar

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