स्वयं से गुफ्तुगु

स्वयं से गुफ्तुगु

एक रात सपने में ,
मैं खुद से मिल रही थी ।
वो अल्हड़ सी, मासूम सी,
मेरे बचपन सी लग रही थी ।

मुस्कुरा के बोली,
“कैसी हो? “
“अच्छी हूँ ” कह के,
मैं संतुष्ट थी ।

पर उसकी हँसी मुझे,
खटक रही थी ।
मैं अपनी हँसी को ढूंढती,
भटक रही थी ।

वो बोली,
“चिंता है “?
” किस बात की? ” कह के
मैं चेहरे की शिकन,
छुपा रही थी ।

सोचा पूछूँ,
तुम कैसे हो स्वछंद।
पर मन ही मन ,
कर रही थी द्वंद ।

क्यों तुम खामोश हो?
अपने दुःख से अंजान हो।
जीवन की आपाधापी में,
तुम खुद की मेहमान हो।

हो समय तो देख लो,
एक नादान, अल्हड़ को।
जी लो अपनी जिंदगी,
पूरे करो अरमानों को।

पंख हैं, बस उड़ लो,
छू लो आसमान को।
एक बार तो उन्मुक्त हँसों,
तोड़ रिश्तों की मर्यादाओं को।

रूचि

What's Your Reaction?

like
0
dislike
0
love
0
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0