तोड़ दो ना, इन कुरीतियों की बेड़ियाँ....

तोड़ दो ना, इन कुरीतियों की बेड़ियाँ....

कोरोना से जिंदगी की जंग हार गये, पति अरुण को देख, निधि बिलख पड़ी। क्या होगा अब?, कैसे होगा..? के असंख्य प्रश्न, मुँह बाये सामने खड़े थे.।बेटी नेहा और बेटे आरुष को देख आँसू रुक ही नहीं रहे थे।


  कई दिन हो गये अरुण को गये, निधि अभी भी यकींन नहीं कर पा रही थी, अरुण उसे छोड़ गये। माँ को देख, बच्चें परेशान थे। नेहा ने एक दिन माँ के गले में हाथ डाल बोली -माँ अगर आप ही हिम्मत हार जाओगी,तो हम कैसे हिम्मत करेंगें। अब तो आप ही हमारी माँ और पापा दोनों हो। बेटी की बात सुन, निधि ने भी अपना दिल कड़ा करने की हिम्मत की।


     

 माँ को श्रंगार विहीन देख, बेटे ने माँ को टोका -आप जैसे पहले रहती थी वैसे ही रहो। ये सफेद साड़ी मत पहनो, रंगीन पहना करो। माथे पर बिंदी भी लगाया करो। निधि गुस्सा हो गईं -"होश में हो आरुष, मै विधवा हूँ, रंगीन कपड़े नहीं पहन सकती, ना सुहाग का कोई चिन्ह लगा सकती हूँ,". "किसने कहा माँ!!" 'समाज कहता हैं बेटा, फिर रिश्तेदार क्या कहेंगे'।"कौन सा समाज माँ!!वो जो पिता को इस कठिन दौर में अस्पताल में एक बेड नहीं दिला पाया। वो रिश्तेदार, जो पिता के अंतिम संस्कार में भी साथ नहीं थे। आप उन्हे रिश्तेदार मानो, मै नहीं मानता।"


"ये बताओ माँ, शर्मा अंकल भी तो अकेले हैं।आंटी नहीं हैं, तो शर्मा अंकल क्यों रंगीन कपड़े पहनते हैं, क्यों बाल काले करते हैं। उनको भी सफेद कपड़े पहनने चाहिए।" वे पुरुष हैं बेटे, उनके लिये नियम नहीं हैं। " "पर क्यों माँ...? पुरुष विधुर हो तो सब शुभ काम कर सकता हैं, रंगीन कपड़े पहन सकता हैं, बाल काले कर सकता हैं, इत्र लगा सकता हैं, फिर स्त्री क्यों नहीं कर सकती ये सब।"


क्यों स्त्री के लिये ही नियम -क़ानून हैं। किसने बनाये ये नियम, पुरुषों ने ही ना, तोड़ दो माँ, इन रीति -रिवाजों को जो कुरीतियाँ हैं समाज की। जो रीति -रिवाज खुशियों को छीन ले, वो कुरीति ही कहलाएगी। इतनी बंदिशे क्यों झेलते हो आप लोग, क्यों नहीं इन बदिशों की बेड़ियाँ तोड़ देती हो। आज आप हिम्मत दिखाओगी, कल आपसे सीख, कोई और हिम्मत दिखायेगा।"


     निधि निरुत्तर थी, ठीक हो तो कह रहा आरुष। शीशे के सामने जब वो खड़ी होती हैं, सूनी मांग और बिंदी विहीन माथा उसे बहुत चोट पहुंचते हैं। हर रोज वो जीने की कोशिश करती हैं, पर मर -मर कर जीती हैं।, पर निधि अभी भी संशय में थी,। उसकी सहेलियाँ, अड़ोसी -पड़ोसी क्या कहेंगे।


एक दिन बोलेंगे माँ, वे सब, फिर सब आपको उसी रूप में स्वीकार कर लेंगे। आज तोड़ दो माँ, इन बदिशों को।"


 सुबह, निधि एक रंगीन साड़ी और माथे पर लगी बिंदी में बहुत सुन्दर लग रही थी। इतने दिन बाद, उसे भी कुछ मन हल्का लग रहा था।


सखियों, मेरी पसंद यहीं हैं, हम सब के चेहरे पर मुस्कान हो, जो रीतियाँ, दुख देती हैं, खुश नहीं रहने देती, उन्हे तोड़ दो। एक की पहल, दूसरे के लिये हिम्मत और जीवन होती हैं। हम स्त्री होकर स्त्री के दुख -दर्द में क्यों साथ नहीं देतीं..? क्यों हम ही दूसरी को बंदिश लगाती हैं। आओ, मिल कर, इन बंदिशों और कुरीतियों की बेड़ियाँ तोड़ दें।

      

              

 --संगीता त्रिपाठी 



       




    



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