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चुप्पी

अभी रात शुरू ही हुए थी। लतिका बिस्तर पर बैठी कुछ लिखने के ऊहा-पोह में थी। दिन के शोर-शराबे के बाद रात के एकाकीपन में खायालों से खुल कर बतियाने और उन्हें लिख डालने का शगल ही कुछ और है। लगभग साढ़े ग्यारह बजे होंगे घर के दीवार से...

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आवाज़- नारी स्वाभिमान की कुंजी

बेटी घर में जन्म लेती है, हँसती-खिलखिलाती है पूरा घर आँगन महकाती है। फिर बचपन की दहलीज पार करते-करते आहिस्ते-आहिस्ते उसे चुप्पी का खास सबक सिखा कर अलग अस्तित्व में ढ़ला जाता है। हवाओं में जो हँसी गूँज रही होती है उसे पल-पल मर्यादा...

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