टैग : #स्त्री तेरे रूप अनेक

ऐ नारी तू कितने किरदार निभाती

निज स्व  को भूल ऐ नारीतू कितने किरदार निभाती।है नारी तू एक ही ना जाने कितने रुप में ढल जाती।तू सृष्टि रचयिता की अदभुत कृति,तुझमें समाहित है सारी विभूति। बन कर अपने हृदयेश्वर की परिणीता

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ये कौन सा रूप है ?

कल अष्टमी के दिन वो सुबह सुबह खिलखिलाती हुई मेरे पास आई, ओर चहकते हुए बोली आपकी वो लाल साड़ी देदोगी मुझे? मै उसे कातर दृष्टि से देख रही थी... वो जानती थी कि मैं नवरात्रि में गांव की सभी लड़कियों को अपनी सारी मंहगी साड़ियां...

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नारी शक्ति का स्वरुप है,

नारी जीवन में निभाती कई किरदार, तुम ही  करती हो शक्ति का संचार, नारी से है तेरे घर की शान,इस के बिना नहीं है तेरे अस्तित्व की पहचान,  नारी  का हर रूप है निराला,चाहे हो दुर्गा...

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नारी हूं मैं , मेरे रूप अनेक

नारी हूं मैंमेरे रूप है अनेक ।हर रूप हर रंग में ,हर रिश्ते हर नाते में ,नाम है मेरे अनेक ।हर नाम में हूं मै ,एक नया संदेश ।नारी हूं मैं ,मेरे रूप हैं अनेक । ईट गारे के बने...

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मॉर्डन दुर्गा का जादू....

                         सच एक स्त्री अनेक रूप को जीती है..। परिस्थिति के अनुसार वो बदल जाती है..। पर अपने नैसर्गिक गुणों को नहीं भूलती। कभी माँ दुर्गा...

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स्त्री से है सृष्टि अनमोल

स्त्री तेरे रुप अनेक  स्त्री से है सृष्टि अनमोल फिर भी न जाने तेरा कोई मोलकर दिया कैद दर्द की दीवारों में उफ़ भी न कर पायी बेगानों से बन कर सरस्वती दूर किया अज्ञान कोक्यों...

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ना जाने नारी कब किस रूप में ढल जाती है।

जन्म लेते ही न जाने कितने रिश्तो में बंध जाती है ... एक बेटी बन परिवार को खुशियों से महकाती है ... बड़े भाई बहन की मानो खुशियो की चाबी बन ...अपनी शरारतों , नादानियों से सारे घर को चहकाती है ... *_ना...

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माँ का प्यार ....

माँ का प्यार .... जब...

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शक्ति रूपेण संस्थिता!

हमारी भारतीय संस्कृति प्राचीन काल से ही स्त्रियों को शक्ति का प्रतीक मानकर उन्हें पूजती आई है। कोई भी देवी-देवताओं से संबंधित पौराणिक कथा उठाकर देख लीजिए सभी में आदिशक्ति का गुणगान है। प्रत्येक वर्ष नवरात्रि का तो हमारे जीवन में...

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स्त्री तेरे रूप अनेक

माँ, बहन, बेटी, पत्नी, प्रेमिका और ना जाने कितने रिश्तो को निभाती है ताउम्र ये स्त्री.. हर रूप मे खुद को पूर्ण करती है स्त्री..  घर और बाहर दोनों जगह कि जिम्मेदारी को बखूबी निभाती है..  करती...

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